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    मुद्दे की बात, राजेश गावड़े के साथ : अविश्वास के साथ गठबन्धन धर्म को कैसे निभाएंगे मोदी

    जनकल्याण टाइमBy जनकल्याण टाइमJune 12, 2024No Comments7 Mins Read
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    गठबन्धन धर्म को निभाने के लिये जिस उदारता एवं लचीलेपन की जरूरत है, वह न तो मोदी में है और न ही भाजपा में। यदि मोदी लचीलापन दिखाते हैं तो उनके समर्थन इस रूप को स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि उनके दिल में मोदी की छवि व स्वीकार्यता उनकी कठोरता के कारण ही है। इसी प्रकार भाजपा के उदार होने पर उसे अनेक उन विषयों को छोड़ना पड़ेगा जो उसकी विचारधारा की पहचान रही है।

    18वीं लोकसभा के लिये हुए चुनावों में जीत दर्ज कर नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री तो बन गये हैं लेकिन वे पहली दो बार की तरह वैसा बड़ा जनादेश लेकर नहीं लौटे हैं। उनकी भारतीय जनता पार्टी के 2014 में 282 और 2019 में 303 सदस्य जीते थे। वैसे तो उन्हें बहुमत के बाद सहयोगी दलों यानी नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीए) के समर्थन की ज़रूरत ही नहीं थी परन्तु उन्होंने दोनों बार कुछ सदस्यों को मंत्री पद दिये थे। इस बार मजबूरी है। खुद की केवल 240 सीटें आने के बाद वे फिर से जो पीएम की गद्दी पर बैठे हैं तो वह आंध्रप्रदेश के चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के 16 और बिहार के नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) की टिकट पर जीते 12 सांसदों की बदौलत। बाकी सहयोगी पार्टियां इतनी कम सीटें लेकर आई हैं कि टीडीपी व जेडीयू के बिना उनका काम चल ही नहीं सकता। चूंकि दोनों दलों के साथ भाजपा के सम्बन्धों का अच्छा और बुरा दोनों ही दौर रहा है, सो लोग आश्चर्य कर रहे हैं कि ये साथ-साथ कैसे काम कर सकेंगे? ऐसे कयास भी लगाये जा रहे हैं कि आखिरकार यह सरकार कब तक चलेगी?

    सभी जानते हैं कि आज की भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त का दल नहीं है जो कई-कई पार्टियों के साथ गठबन्धन कर सरकार चला चुकी है। गठबन्धन धर्म के मूल में परस्पर सम्मान व विश्वास होता है जो मोदी और उनके प्रमुख सिपहसालार यानी गृह मंत्री अमित शाह में नहीं है। जिनके साथ भाजपा हाथ मिलाती है, उसे अपने हाथों की उंगलियों को गिनना पड़ता है कि पूरी हैं या नहीं। महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में अकाली दल, रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी आदि उदाहरण हैं। अब मोदी-शाह का पाला बहुत सावधान दलों से पड़ा है- टीडीपी व जेडीयू। दोनों ही अपने अस्तित्व को लेकर सदैव सावधान एवं विस्तार के प्रति हमेशा उत्सुक रहती हैं।

    दोनों अच्छे मोल-भाव करने वाले हैं। जैसा सुलूक दूसरे दलों के साथ मोदी ने किया, वैसा इनके साथ करना मुश्किल होगा। दोनों में से किसी को भी महसूस हुआ कि भाजपा उसकी जमीन हड़पने की कोशिश कर रही है तो उन्हें एनडीए को जय श्रीराम कहने में देर नहीं लगेगी। वैसे यह भी माना जा रहा है और जैसा सभी एक स्वर में कह रहे हैं कि जोड़-तोड़ कर सरकार बनाना तो एक बात है, उसे चलाना दूसरी बात। इसमें मुख्य रूप से आड़े आएगी मोदी की प्रवृत्ति। तीन बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हों या दस साल से पीएम- मोदी किसी के साथ विचार-विमर्श की परम्परा का हिस्सा नहीं बने। विपक्षी दलों की बात तो दूर है, अपने ही दल या यहां तक कि मंत्रिमंडल के साथ चर्चा कर उन्होंने कोई काम नहीं किया। ऐसे में सवाल यह उठाया जा रहा है कि इस बार क्या वे अपनी आदत बदलेंगे? फिर, उनकी अपनी पार्टी के मंत्री-सांसद तो यह तरीका स्वीकार कर चुके हैं और जो सहयोगी दल मोदी पर आश्रित हैं या जिनके कारण उनकी सरकार का कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है, वे भी एनडीए को समर्थन देते रहेंगे। टीडीपी एवं जेडीयू सम्भवत:मोदी के इस रवैये को न तो पसंद करेंगे और न ही स्वीकार। उन्हें महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल न करने से ये दल सोच सकते हैं कि मोदी ने उन्हें एनडीए में शामिल तो कर लिया है लेकिन उन पर विश्वास नहीं किया जा रहा है।

    जहां तक मंत्रिमंडल के विकास सम्बन्धी जो कार्यकलाप होंगे उन पर तो सामान्य चर्चाओं में सभी घटक दल शामिल किये जा सकते हैं परन्तु ऐसे कुछ विषय जिन पर वैचारिक विभिन्नता है, उन पर अगर मोदी सरकार ने एकतरफा निर्णय लिये तो एनडीए में खटास पैदा हो सकती है। यहां फिर से मुख्य सन्दर्भ टीडीपी व जेडीयू का है। अल्पसंख्यकों एवं ओबीसी ही नहीं, भाजपा के एजेंडे से सम्बन्धित कोई भी निर्णय अब सम्भवत: एकतरफा नहीं लिया जा सकेगा।

    अहम विभाग खुद के पास और गैर महत्वपूर्ण विभागों को सहयोगी दलों को देकर भाजपा ने जतला दिया है कि वह अपनी पिछली सरकार के छोड़े गये कार्यों को ही आगे बढ़ायेगी, परन्तु उससे यह भी साफ हो जाता है कि भाजपा का अन्य किसी पर भरोसा नहीं है। इस बात का बड़ा शोर है कि जिस प्रकार से अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए (1999-2004) सरकार में टीडीपी ने अपने सदस्य जीएमसी बालयोगी को लोकसभा अध्यक्ष बनवाया था, वैसा ही वह इस बार भी मांग करने जा रही है। दलबदल की स्थिति में अध्यक्ष की भूमिका एवं उसके फैसले बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसलिये इस पद के लिये खींचतान व मनमुटाव दोनों हो सकता है। दूसरी तरफ, अमित शाह को फिर से गृह मंत्री बनाना यह बतलाता है कि ‘ऑपरेशन लोटसÓ जारी रहेगा। चूंकि भाजपा के लिये ज़रूरी है कि वह टीडीपी-जेडीयू के दबाव से मुक्त होने के लिये किसी भी तरह से अपने सदस्यों की संख्या को बहुमत के 272 के आंकड़े को छुए- वह पहले तो विपक्षी दलों के सदस्यों पर दबाव डालकर उन्हें अपने खेमे में लाने की कोशिश करेगी। इस प्रक्रिया में अगर उसने अपने किसी सहयोगी दलों को हाथ लगाया तो सम्बन्ध बिगड़ सकते हैं।

    दृष्टिकोण एवं विमर्शों का टकराव एनडीए की प्रमुख पार्टी भाजपा एवं अन्य दलों के साथ लाजिमी है। खासकर टीडीपी व जेडीयू के साथ खटपट कई विषयों पर हो सकती है लेकिन अब की छोटे दलों का भी रवैया बदला हुआ सा हो सकता है। बहुमत के लिये जितनी बड़ी संख्या में (32) भाजपा को सदस्य जुटाने आवश्यक हैं, उन्हें यह साफ दिख रहा है कि वह काफी कठिन है। वे यह भी जानते हैं कि सरकार बचाने के लिये एक-एक सदस्य का महत्व है। कई दल तो ऐसे हैं जो कम होने पर भी उनका दूसरे परिप्रेक्ष्य में महत्व है। मसलन हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी। अकेले जीतकर आने के बाद भी उन्हें इसलिये कैबिनेट पद दिया गया है क्योंकि एक बड़ा समुदाय उनके साथ जुड़ा हुआ है। जीतन राम के जरिये भाजपा को उस वर्ग का समर्थन सभी जगह मिल सकता है।

    बार-बार कहा जा रहा है कि गठबन्धन धर्म को निभाने के लिये जिस उदारता एवं लचीलेपन की जरूरत है, वह न तो मोदी में है और न ही भाजपा में। यदि मोदी लचीलापन दिखाते हैं तो उनके समर्थन इस रूप को स्वीकार नहीं करेंगे क्योंकि उनके दिल में मोदी की छवि व स्वीकार्यता उनकी कठोरता के कारण ही है। इसी प्रकार भाजपा के उदार होने पर उसे अनेक उन विषयों को छोड़ना पड़ेगा जो उसकी विचारधारा की पहचान रही है। मुस्लिमों के लिये जिस तरह के कार्यक्रमों का टीडीपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादा किया है, उन्हें तो वह लागू करेगी ही क्योंकि लोकसभा चुनाव के साथ हुए विधानसभा चुनाव में टीडीपी को बहुत बड़ा जनादेश मिला है। यहां भाजपा ने उसके साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि सरकार तो टीडीपी अकेली बना सकती है परन्तु भाजपा व एक अन्य सहयोगी दल जन सेना पार्टी भी प्रदेश सरकार में शामिल रहेगी। क्या ये फैसले भाजपा के समर्थकों को स्वीकार्य होंगे? ऐसे ही, जेडीयू जातिगत जनगणना की मांग करती आई है। उस मांग को वह भाजपा के दबाव में भी नहीं छोड़ेगी क्योंकि ऐसा करने पर उसे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में नुकसान होगा।

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