
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट सिर्फ यात्रा दस्तावेज है. नागरिकता का प्रमाण नहीं. इस बयान से विपक्षी दलों में तूफान खड़ा हो गया. विपक्ष ने पूछा कि फिर नागरिकता साबित करने के लिए कौन सा दस्तावेज पर्याप्त है.
भारत में पासपोर्ट को लेकर एक नया विवाद छिड़ गया है. विदेश मंत्रालय ने 24 जून 2026 को पासपोर्ट सेवा दिवस पर कहा कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है. इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए. इस साधारण लगने वाले बयान ने पूरे देश में राजनीतिक हलचल मचा दी है.
विपक्षी नेताओं ने सरकार पर हमला बोल दिया है, जबकि भाजपा ने इसे कानून और अदालतों द्वारा तय पुरानी बात बताया है. यह विवाद मतदाता सूची संशोधन और नागरिकता दस्तावेजों की बहस के बीच आया है. विदेश मंत्रालय का बयान पासपोर्ट सेवा दिवस के मौके पर आया.
विदेश मंत्रालय ने कहा कि पासपोर्ट जारी करने में पुलिस वेरिफिकेशन और कई सरकारी दस्तावेजों की जांच होती है, लेकिन नागरिकता का फैसला संविधान और नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार होता है. यह स्पष्टीकरण तब आया जब पूछा गया कि क्या पासपोर्ट को नागरिकता साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
विदेश मंत्रालय ने ठीक-ठीक क्या कहा?
24 जून को विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने प्रेस ब्रिफिंग में साफ कहा कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का दस्तावेज नहीं. हालांकि पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है, लेकिन कानूनी रूप से यह नागरिकता का कॉन्क्लूसिव प्रूफ (अंतिम प्रमाण) नहीं है. मंत्रालय ने जोर दिया कि पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा को आसान बनाने के लिए बनाया गया है.
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई लोग पासपोर्ट को अपनी भारतीय नागरिकता का सबसे मजबूत सबूत मानते हैं. MEA ने यह भी कहा कि पासपोर्ट जारी करने से पहले गहन जांच होती है, फिर भी नागरिकता का अंतिम फैसला नागरिकता कानून के तहत होता है.
विपक्ष क्यों नाराज है
विपक्षी दलों ने इस बयान को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं. पूर्व कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो आम नागरिक कैसे अपनी नागरिकता साबित करेंगे. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि सरकार के अनुसार कोई भी दस्तावेज नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है. 2030 तक सिर्फ एक दस्तावेज बचेगा – भाजपा का सदस्यता कार्ड.
कपिल सिब्बल ने आगे कहा कि अगर बूथ लेवल अधिकारी (BLO) किसी की नागरिकता पर संदेह कर सकता है और उसे वोटिंग अधिकार से वंचित कर सकता है, तो यह मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा. AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और लेखक-गीतकार जावेद अख्तर ने भी इस बयान पर चिंता जताई. जावेद अख्तर ने इसे अब्सर्ड बताया और पूछा कि अगर पासपोर्ट नहीं तो कौन सा दस्तावेज भारतीय होने का प्रमाण है.
विपक्ष का कहना है कि यह बयान मतदाता सूची संशोधन (SIR) के समय आया है, जिससे लाखों लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने में दिक्कत हो सकती है. वे डर जता रहे हैं कि सामान्य नागरिकों को परेशानी होगी.
कानून क्या कहता है?
सरकार का रुख पासपोर्ट एक्ट 1967 पर आधारित है. इस कानून के अनुसार केंद्र सरकार कुछ खास परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है. इसलिए पासपोर्ट रखना अकेले में नागरिकता का अंतिम सबूत नहीं माना जा सकता.
भारतीय नागरिकता का फैसला नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत होता है. इसमें जन्म, वंश, पंजीकरण, नैचुरलाइजेशन या क्षेत्र के शामिल होने के आधार पर नागरिकता मिलती है. सरकार कहती है कि नागरिकता एकल दस्तावेज से नहीं, बल्कि कई दस्तावेजों के संयोजन से तय होती है.
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2013 के एक फैसले में साफ कहा था कि पासपोर्ट अकेले नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता. अदालत ने कहा कि नागरिकता का फैसला नागरिकता अधिनियम और अन्य सबूतों के आधार पर होना चाहिए. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पासपोर्ट नागरिकता का समर्थन करने वाला सबूत तो हो सकता है, लेकिन यह एकमात्र और निर्णायक दस्तावेज नहीं है.
भाजपा का जवाब
भाजपा नेता अमित मालवीय ने कहा कि MEA ने कोई नई नीति नहीं बताई, बल्कि लंबे समय से तय कानूनी स्थिति को दोहराया है. उन्होंने कहा कि नाराजगी नए नियम पर नहीं, बल्कि पुराने कानून और अदालती फैसलों पर है.
मालवीय ने जोर दिया कि नागरिकता जन्म प्रमाण-पत्र, माता-पिता के दस्तावेज, मतदाता सूची, स्कूल प्रमाण-पत्र, जमीन के रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज और पासपोर्ट आदि के संयोजन से साबित होती है. भाजपा का कहना है कि विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए इस मुद्दे को भड़ा रहा है.
नागरिकता साबित करने का दस्तावेज क्या है
यह विवाद एक बुनियादी सवाल उठा रहा है – अगर गहन जांच के बाद जारी पासपोर्ट भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो आखिर कौन सा दस्तावेज पर्याप्त है? कानून और अदालती फैसलों के अनुसार कोई एक दस्तावेज अकेले नागरिकता तय नहीं करता. नागरिकता अधिनियम के तहत कई दस्तावेजों को मिलाकर देखा जाता है.

