एक बार एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ एक पर्वतीय स्थल पर ठहरे हुए थे. शिष्यों के साथ महात्मा शाम के समय भ्रमण करने के लिए निकले. शिष्य और महात्मा सभी हरियाली, पेड़-पौधे और पहाड़ों के खूबसूरत प्राकृतिक मनमोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे. तभी विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के मन में उत्सुकता जागी और उसने महात्मा से पूछा कि, इन चट्टानों में तो किसी का शासन नहीं होगा, क्योंकि ये अटल, अविचल और कठोर हैं.
शिष्य का सवाल सुनकर महात्मा बोले कि- बिल्कुल नहीं, इन शक्तिशाली, अविचल और अटल चट्टानों पर भी किसी का शासन है और वह है ‘लोहा’. लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं. यह सुनकर शिष्य ने कहा- तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?
महात्मा मुस्कराते हुए बोले कि- नहीं, लोहा भी सर्वशक्तिमान नहीं है. क्योंकि अग्रि अपने ताप से लोहे को पिघला सकती है और इसका रूप परिवर्तित कर सकती है. शिष्य महात्मा को धैर्यपूर्वक सुन रहा था, वह बोला- तब तो अग्रि सर्वशक्तिमान है. महात्मा ने फिर से वैसा ही उत्तर दिया. महात्मा बोले नहीं. अग्नि भी सर्वशक्तिमान नहीं है. क्योंकि जल अग्रि की उष्णता को शीतलता में परिवर्तित कर देता है और इस तरह के धधकती अग्रि भी जल से शांत हो जाती है. महात्मा का जवाब सुनते ही शिष्य फिर से कुछ सोचने लग गया.
महात्मा शिष्य के मन में चल रही उत्सुकता को समझ गए थे कि, उसकी जिज्ञासा अबतक पूरी तरह से शांत नहीं हुई है. अब शिष्य फिर कोई सवाल करता, इससे पहले महात्मा ने उत्तर दिया कि, वायु का. क्योंकि वायु का वेग जल की दिशा को बदल देता है.
शिष्य कुछ कहता इससे पहले महात्मा ने कहा कि,अब तुम कहोगे कि तब तो वायु सबसे शक्तिशाली है. लेकिन नहीं, वायु भी सबसे शक्तिशाली नहीं है. इस संसार में सर्व शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्प शक्ति. क्योंकि इससे पृथ्वी, जल, वायु, अग्रि आदि सभी को नियंत्रित किया जा सकता है. इसलिए व्यक्ति को अपने भीतर की संकल्प शक्ति का विकास करने की आवश्यकता है. क्योंकि जीवन में कोई भी महत्वपूर्ण कार्य बिना संकल्प शक्ति के असंभव है.
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