
ईरान की वॉर स्ट्रैटजी तीन फेज में है- पहले ब्लाइंड… सस्ते स्वार्म ड्रोन और मिसाइलों से अमेरिका-इजरायल के रडार और कमांड सेंटर को नष्ट करना. दूसरा डिप्लीट… कम लागत वाले हथियारों से दुश्मन के महंगे इंटरसेप्टर खत्म करवाना. तीसरा ओवरव्हेल्म… कमजोर डिफेंस पर हाइपरसोनिक और बैलिस्टिक मिसाइलों से बड़े हमले करना.
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़े हमले शुरू किए. इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई, आईआरजीसी कमांडर और कई बड़े नेता मारे गए. ईरान के परमाणु स्थलों, युद्धपोतों और 2000 से ज्यादा टारगेट्स पर हमले हुए.
ईरान ने जवाब में इजरायल, अमेरिकी बेस और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. यूएई जैसे देशों ने ज्यादातर मिसाइलों को रोक लिया लेकिन महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल करके अरबों डॉलर खर्च हो गए.
ईरान की रणनीति साफ है – पहले दुश्मन को अंधा करना, फिर उनकी रक्षा प्रणाली को कमजोर करना और आखिर में बड़े हमलों से उन्हें हरा देना. यह तीन चरणों वाली योजना है जिसे ब्लाइंड, डिप्लीट और ओवरव्हेल्म कहा जाता है. ईरान सस्ते हथियारों से महंगे अमेरिकी डिफेंस सिस्टम को थका देना चाहता है.
ईरान की पहली रणनीति दुश्मन की आंखें यानी रडार, सेंसर और कमांड सेंटर को नष्ट करना है. ईरान सस्ते स्वार्म ड्रोन और मिसाइलों से अमेरिका के इंटीग्रेटेड सेंसर नेटवर्क, रडार और कमांड एंड कंट्रोल नोड्स पर हमला करता है. ये सस्ते ड्रोन और मिसाइलें रडार को टारगेट करके दुश्मन की नजर बंद कर देते हैं.
इससे अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को आने वाले हमलों का पता देर से चलता है. ईरान का मकसद है कि दुश्मन की हवाई रक्षा कमजोर हो जाए. वे अंधेरे में लड़ें. शुरुआती हमलों में ईरान ने ऐसे कई सस्ते ड्रोन और मिसाइलें इस्तेमाल कीं ताकि अमेरिका-इजरायल की निगरानी कम हो. यह चरण दुश्मन को कमजोर बनाने का आधार बनाता है.

