लोन गुजारा भत्ता घटाने का आधार नहीं हो सकता, जानें पति का याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा

मुंबई : बॉम्बे हाई कोर्ट ने साफ किया है कि पति ने भले ही पहले पत्नी के उपचार के लिए लोन लिया था, मगर यह लोन पत्नी को दिए गए अंतरिम गुज़ारे भत्ते को घटाने का आधार नहीं हो सकता है। कोर्ट ने यह बात गुज़ारे भत्ते की रकम के खिलाफ पति की अर्ज़ी को खारिज़ करते हुए स्पष्ट की है। फैमिली कोर्ट ने पति को उससे अलग रह रही पत्नी को दस हजार रुपये गुजारे भत्ते के रूप में देने का निर्देश दिया था। यह रकम पत्नी और दो बच्चों के लिए दी गई थी। 31 नवंबर, 2022 के फैमली कोर्ट के इस आदेश को पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

पति ने पैसे देने में जताई थी असमर्थता
निजी कंपनी में कार्यरत पति ने याचिका में कहा था कि उसका मासिक वेतन 20 हजार रुपये है, ऐसे में उसके लिए 10 हजार रुपये दे पाना काफी मुश्किल है। यह रकम काफी ज्यादा है। उसने पत्नी के मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए पहले लोन लिया था, जिसकी ईएमआई का भुगतान वह कर रहा है। याचिका पर सुनवाई के बाद जस्टिस देशमुख ने कहा कि महिला की कोई कमाई नहीं है, उसके दो बच्चे है। एक की उम्र दस साल है, जबकि दूसरे की उम्र दो साल है। एक साल पहले फैमिली कोर्ट ने गुजारे भत्ते की रकम को लेकर आदेश जारी किया था। अब निश्चित तौर पर पति की आय में वृद्धि हुई होगी। इसीलिए गुजारे भत्ते की रकम को घटाने के लिए लोन के तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शिक्षा खर्च के लिहाज़ से रकम कम: कोर्ट
जस्टिस देशमुख ने कहा कि वर्तमान में बढ़ महंगाई पर विचार किया जाए और बच्चों की पढ़ाई के खर्च को देखा जाए, तो यह रकम बिल्कुल भी अधिक नज़र नहीं आती है। अब तो बड़ा बेटा अगली क्लास में जाएगा, जिससे शिक्षा का खर्च और बढ़ेगा। दूसरे बेटे के पढ़ाई की तैयारी करनी होगी। एक पिता होने के नाते याचिकाकर्ता की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने बच्चों की देखभाल का दायित्व निभाए। जस्टिस देशमुख ने कहा कि मेरी राय में दस हजार रुपये की रकम बेहद कम है, क्योंकि पत्नी के पास आय का कोई स्रोत नहीं है। ऐसे में, यदि पत्नी शिक्षा के खर्च का हवाला देकर फैमिली कोर्ट में गुज़ारे भत्ते की रकम में बढ़ोतरी के लिए आवेदन करती है, तो अदालत इस पर विचार कर सकती है।

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