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    जिसने असम का ये समीकरण साध लिया, चुनाव उसी का… समझ लीजिए हर इलाका और हर समीकरण

    जनकल्याण टाइमBy जनकल्याण टाइमApril 7, 2026No Comments7 Mins Read
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    असम विधानसभा चुनाव के लिए 9 अप्रैल को मतदान है, जिसके लिए 722 उम्मीदवार मैदान में है. असम तीन सियासी इलाकों में बंटा हुआ है और हर इलाके का अपना सियासी मिजाज और पैटर्न अलग-अलग है. ऐसे में असम की चुनावी लड़ाई जितनी सीधी दिख रही है, उतनी है नहीं?

    असम विधानसभा चुनाव के लिए मंगलवार शाम प्रचार का शोर थम जाएगा. बीजेपी ने सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए जोर लगा रखा है तो कांग्रेस अपने 10 साल के वनवास को खत्म करना चाहती है. बदरुद्दीन अजमल मुस्लिम वोटों के सहारे चुनावी लड़ाई को त्रिकोणीय बनाने में जुटे हैं. ऐसे में देखना है कि परिसीमन के बाद पहली बार हो रहे असम का चुनाव किस करवट बैठेगा?

    राज्य की 126 सीटों के लिए 722 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं, लेकिन यह चुनावी लड़ाई सीधी नहीं है. असम का चुनाव तीन पॉकेट में बंटा हुआ है. ऊपरी, मध्य और निचले असम की चुनावी और राजनीतिक जंग है, जहां का सामाजिक ढांचा, मुद्दे और वोटिंग के पैटर्न एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं.

    असम के 2021 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को 75 और कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें मिली थी.तब बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) भी कांग्रेस गठबंधन में शामिल थी, लेकिन इस बार अलग चुनाव लड़ रही है. कांग्रेस ने इस बार लेफ्ट के साथ असम की दो क्षेत्रीय दलों के साथ भी हाथ मिला रखा है, लेकिन सवाल यही है कि बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर पाएगी?

    असम में किस पार्टी के कितने उम्मीदवार

    असम की कुल 126 सीटों के लिए 722 उम्मीदवार मैदान में है, जिसमें 663 पुरुष और 59 महिला प्रत्याशी हैं. एनडीए में बीजेपी सबसे ज्यादा 90 सीट पर अपने उम्मीदवार उतार रखे हैं तो उसके सहयोगी दलों में असम गढ़ परिषद (एजेपी) 26 सीट और बीपीएफ 11 सीट पर चुनाव लड़ रही है. एक सीट पर बीजेपी और एजेपी दोनों ने अपने-अपने उम्मीदवार उतार रखे हैं.

    वहीं, कांग्रेस ने असम की 99 सीट पर उम्मीदवार उतार रखा है तो सहयोगी दलों में रायजोर दल 13 सीट और असम जातीय परिषद 10 सीट पर चुनाव लड़ रही है. इसके अलावा सीपीआई माले 2 सीट, सीपीएम 2 सीट और एपीएलसी दो सीट पर चुनाव लड़ रही. बदरुद्दीन अजमल की पार्टी 27 सीट पर अपने उम्मीदवार उतार रखे हैं तो टीएमसी 23 सीट पर चुनाव लड़ रही है. जेएमएम 19 सीटों पर चुनाव में किस्मत आजमा रही है. इसके अलावा 258 उम्मीदवार निर्दलीय मैदान में है.

    असम की 126 सीटों का पूरा गुणा-गणित

    असम की सभी 126 सीटों पर चुनाव एक जैसा नहीं बल्कि तीन अलग-अलग क्षेत्र हैं और हर एक क्षेत्र का अपना सियासी मिजाज है. ऐसे में ऊपरी असम में 35 विधानसभा सीटें आती है तो मध्य असम जिसे बोडोलैंड के नाम से जाना जाता है, उसमें 41 सीटें आती हैं. निचले असम में 50 विधानसभा सीटें आती हैं. ऐसे में साफ है कि असम का निचला इलाका ही सत्ता के समीकरण को बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है.

    2021 के चुनाव में एनडीए ने 75 फीसदी सीटें जीतने में कामयाब रही थी, तो कांग्रेस गठबंधन 50 सीट पर सिमट गया था. सीटों का भले ही अंतर दोनों में रहा हो, लेकिन वोट शेयर में बहुत ज्यादा फर्क नहीं था. बीजेपी 33 फीसदी वोट पाई थी तो कांग्रेस 30 फीसदी वोट पाने में सफल रही

    असम के तीन अलग-अलग इलाके का पैटर्न

    निचले असम का इलाका बांग्लादेश से सटा हुआ है, जहां पर मुस्लिम वोटर्स निर्णायक हैं. इस क्षेत्र में 50 सीटें आती हैं, जिसमें से एनडीए के पास 23 सीटों तो कांग्रेस-एआईयूडीएफ ने 27 सीटें जीती थी. धुबरी, बारपेटा,गोलपाड़ा क्षेत्र में मुस्लिम वोटर बड़ी संख्या में है, जहां पर कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के बीच मुकाबला, क्योंकि पिछली बार एआईयूडीएफ 16 सीटें जीती थी, लेकिन हालात इस बार बदले हुए हैं.

    ऊपरी असम को भाजपा का गढ़ माना जाता है, यहां की 35 सीटों में से एनडीए 30 सीटें जीतने में कामयाब रही थी तो कांग्रेस को पांच सीटें ही मिली थी. बीजेपी इस गढ़ के आधार पर सत्ता में रिपीट की थी. तिनसुकिया, शिवसागर, डिब्रूगढ़, जोरहाट जैसे जिलों वाला इलाका सियासी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता है. परिसीमन के बाद जनजातीय आबादी बढ़ना बीजेपी के लिए मुफीद माना जा रहा है, लेकिन इस बार आदिवासी आधार वाले कई दल उतरन से गेम बदल सकता है, क्योंकि कांग्रेस ने भी इस बार इसी इलाके पर जोर लगाया है.

    मध्य असम को सत्ता का टर्निंग प्वाइंट माना जाता है, यहां 41 सीटें आती हैं. 2021 में एनडीए 22 सीटें तो कांग्रेस ने 16 सीटें जीती थी. ये इलाका क्षेत्रीय दलों के लिए अहम माना जाता है. नगांव, मोरीगांव के साथ बोडोलैंड क्षेत्र शामिल है, जहां जातीय और क्षेत्रीय राजनीति का असर दिखता है, परिसीमन ने राजनीति को नया आकार दिया है और कई सीटों की सीमाएं बदल गई हैं, तो सीटों का पुनर्गठन और संतुलन भी बदला हुआ है, एसटी सीटों की संख्या बढ़ी है तो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी संरचनागत बदलाव आया है.

    परिसीमन से चुनाव में किसका बिगड़ेगा गेम

    असम में परिसीमन के बाद पहली बार चुनाव हो रहे हैं. परिसीमन के कारण राज्य में मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 से घट कर 22 रह गई है. ऐसे में सत्ता के दावेदारों में महिला वोटरों और चाय बागान मजदूरों को लुभाने की होड़ मची है. बागान मजदूर कम से कम 36 सीटों पर निर्णायक हैं

    बीजेपी इस बार ध्रुवीकरण के सहारे मैदान में है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लंबे समय से ‘मियां’मुसलमानों के खिलाफ मुखर रहे हैं. इसकी वजह से राज्य में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तेज हुआ है. वहीं, कांग्रेस ने अल्पसंख्यक के खिलाफ सत्तारूढ़ पार्टी के आक्रामक बयानों के अलावा मुख्यमंत्री के कथित भ्रष्टाचार को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाने का फैसला किया है.

    बीजेपी के लिए असम में चुनाती बन गया चुनाव

    असम चुनाव में घुसपैठ के पारंपरिक मुद्दे के अलावा कई नए मुद्दों के छाए रहे हैं. घुसपैठ का मुद्दा असम में दशकों पुराना है और असम आंदोलन के बाद लगभग हर चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा रहा है.विपक्षी दल, बीजेपी के खिलाफ भारतीय नागरिकों को विदेशी करार देकर जबरन सीमा पार धकेलने का भी मुद्दा उठा सकते हैं.

    पहले माना जा रहा था कि इस चुनाव में बीजेपी को विपक्ष की कड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा. लेकिन विपक्षी गठबंधन तैयार होने के बाद अब बीजेपी की राह आसान नहीं लग रही है. लंबे समय तक जारी कयासों के बाद कांग्रेस ने अखिल गोगोई की राइजोर दल के साथ हाथ मिलाया है. विपक्षी गठबंधन में अब इन दोनों पार्टियों के अलावा असम जातीय परिषद और ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस जैसे राजनीतिक दल शामिल हैं. एनडीए की सहयोगी रही यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल इस बार मतभेदों के कारण निर्दलीय के तौर पर मैदान में है.

    विश्लेषकों का कहना है कि कई सीटों पर अहोम समुदाय के वोटर निर्णायक हैं और यह तबका इस बार कांग्रेस के पक्ष में झुका नजर आ रहा है. इस वजह कांग्रेस के गौरव गोगोई, राइजोर दल के अखिल गोगोई और असम जातीय परिषद के लुरिन ज्योति गोगोई का साथ मिल कर लड़ना है.यह तीनों नेता अहोम समुदाय के हैं. पिछले चुनाव में विपक्ष में एकता की कमी ने एनडीए को बढ़त दे दी थी. लेकिन इस बार गठबंधन के कारण विपक्ष मजबूत नजर आ रहा है.

    महिला और जेन की वोट पर बीजेपी की उम्मीद

    बीजेपी सरकार की उम्मीदें महिला वोटरों पर टिकी हैं. चुनाव से ठीक पहले सरकार ने अरुणोदय योजना के तहत राज्य की करीब 40 लाख महिलाओं के खाते में 3,600 करोड़ की रकम भेजी थी. असम में महिला वोटरों की तादाद पुरुषों के समान ही है. कई सीटों पर उनके वोट निर्णायक हैं.

    असम में क्यों हो रही है सौगातों की बरसात: पत्रकारों को मोबाइल, महिलाओं के खाते में एकमुश्त रकम और छात्रों के लिए वित्तीय सहायता. इसी तरह राज्य के जेन जी वोटर इस बार राजनीतिक दलों की बजाय उम्मीदवारों को उनकी छवि और कामकाज के आधार पर वोट देने का मन बना रहे हैं. कहा जा रहा है कि युवा वोटर इस बार आंख मूंद कर किसी पार्टी का समर्थन नहीं करेंगे.ऐसे में बीजेपी की उम्मीदें इन्हीं वोटों पर टिकी हुई है.

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