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    बचा खुचा वामपंथ… केरल में अगर हारा लेफ्ट तो बस इतना रह जाएगा वजूद

    जनकल्याण टाइमBy जनकल्याण टाइमApril 30, 2026No Comments6 Mins Read
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    देश में लेफ्ट की पहली सरकार केरल में बनी और उसके बाद बंगाल और त्रिपुरा की सत्ता में काबिज हुई, लेकिन एक के बाद एक लेफ्ट का किला ढहता जा रहा है. अब वामपंथ की राजनीति का आखिरी दुर्ग केरल बचा है और एग्जिट पोल की तरह चुनावी नतीजे रहे तो फिर लेफ्ट मुक्त भारत बन जाएगा.

    केरल विधानसभा चुनाव 2026 के फाइनल नतीजे 4 मई को आएंगे, लेकिन उससे पहले आए एग्जिट पोल के मुताबिक राज्य की सियासत में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे है. विभिन्न सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल में इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि इस बार केरल में सत्ता परिवर्तन हो सकता और कांग्रेस के अगुवाई वाले यूडीएफ गठबंधन की सरकार में वापसी हो सकती है.

    केरल चुनाव को लेकर ज्यादातर एग्जिट पोल में यूडीएफ को आसानी से बहुमत मिलता दिख रहा है तो एलडीएफ जादूई आंकड़े से काफी दूर दिख रहा. पोल ऑफ पोल्स के मुताबिक केरल की 140 सीटों में से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 77 सीटें मिलती दिख रही हैं जबकि लेफ्ट के अगुवाई वाले एलडीएफ को 59 सीटें ही मिलने का अनुमान है.

    एग्जिट पोल के आंकड़े अगर 4 मई को चुनावी नतीजे में अगर तब्दील होते हैं तो लेफ्ट मुक्त भारत बन जाएगा. केरल लेफ्ट का इकलौता दुर्ग बचा हुआ है, जहां सत्ता में है. ऐसे में केरल का भी चुनाव लेफ्ट हार जाती है तो 73 साल में पहली बार होगा, जब देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं होगी. ऐसे में सवाल उठता है कि लेफ्ट फिर कहां कहां रह जाएगा

    केरल में लेफ्ट का किला ढह जाएगा?

    केरल की 140 विधानसभा सीट के नतीजे लेफ्ट के सियासी भविष्य को तय करेंगे. राज्य में सरकार बनाने के लिए बहुमत (71 सीटें) ही काफी है, लेकिन एग्जिट पोल में ज्यादातर एजेंसियां कांग्रेस गठबंधन को बहुमत मिलता दिखा रही है और लेफ्ट की सत्ता से विदाई के अनुमान जता रहे हैं. एक्सिस माए इंडिया के एग्जिट पोल में यूडीएफ को 78-90 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत के संकेत दिए हैं तो एलडीएफ को 49-62 सीटों मिलने की संभावना जतायी है.

    जेवीसी के सर्वे के मुताबिक यूडीएफ को 72-84 सीटें मिल सकती हैं, जबकि एलडीएफ 52-61 सीटों तक सीमित रह सकता है. पीपल्स इनसाइट के एग्जिट पोल ने जरूर केरल के चुनावी मुकाबले को रोचक बताया है. इसके मुताबिक यूडीएफ को 66-76 सीटें मिलने का अनुमान है, जो उसे बहुमत के करीब या उससे थोड़ा ऊपर रखता है तो एलडीएफ को 63-71 सीटों के बीच बताया गया है, यानी मुकाबला काफी करीबी हो सकता है.

    लेफ्ट का आखिरी दुर्ग केरल बचा है?

    2021 के विधानसभा चुनाव में एलडीएफ ने शानदार जीत दर्ज करते हुए 140 में से 99 सीटें जीती थीं जबकि यूडीएफ को 41 सीटों पर संतोष करना पड़ा था. इस तरह 50 साल में पहली बार था, जब केरल में कोई सत्ताधारी पार्टी की सरकार लगातार दूसरी बार बनी थी. पिनराई विजयन ने इतिहास रच दिया था और वामपंथ के दुर्ग को बचाए रखा था, लेकिन इस बार सियासी फिजा बदली हुई है.

    केरल का एक के बाद एक सियासी किला ढहता जा रहा है. साल 1957 में सबसे पहले लेफ्ट की सरकार केरल में बनी थी. इसके बाद एक समय देश के तीन राज्यों में लेफ्ट की सरकारें थी. बंगाल, केरल और त्रिपुरा लेफ्ट का मजबूत दुर्ग माना जाता था. लेफ्ट की पहली सरकार केरल में 1957 में बनी. इसके बाद 1977 बंगाल और त्रिपुरा में एक साथ लेफ्ट सत्ता में आई. बंगाल में करीब साढ़े तीन दशक तक सत्ता में रहने के बाद 2011 में बाहर होना पड़ा. त्रिपुरा में 1998 से 2018 लगातार लेफ्ट सत्ता में रही.

    केरल में लेफ्ट के लिए करो या मरो?

    बंगाल और त्रिपुरा की सत्ता से बाहर होने के बाद लेफ्ट का इकलौता सियासी दुर्ग केरल बचा हुआ है, जहां पर सत्ता में है. ऐसे में केरल विधानसभा चुनाव में लेफ्ट को हार मिलती है और सत्ता से बाहर होती है तो फिर देश के किसी भी राज्य में उसकी सरकार नहीं रह जाएगी. बंगाल में लेफ्ट का एक भी विधायक नहीं है तो त्रिपुरा की सत्ता से बाहर है. एग्जिट पोल के मुताबिक लेफ्ट का आखिरी दुर्ग केरल भी ढहता हुआ नजर आ रहा है.

    मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में लेफ्ट लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है.80 वर्षीय पिनराई विजयन एक दशक से केरल के सत्ता में बने हुए हैं, लेकिन सियासी माहौल लेफ्ट के खिलाफ है और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के पक्ष में है. केरल में सत्ता विरोधी लहर का सामना वाममोर्चा को भी करना पड़ रहा था. इसके चलते सियासी चुनौतियां खड़ी होती, लेकिन एग्जिट पोल के सर्वे अगर नतीजे में तब्दील होते हैं तो फिर सत्ता से विदाई तय है. इस तरह लेफ्ट का आखिरी किला भी ढह जाएगा.

    देश में कहां-कहां ‘बचा वामपंथ’

    लेफ्ट का एक के बाद एक सियासी किला ढहता जा रहा है. लेफ्ट जिस बंगाल में करीब साढ़े तीन दशक तक राज किया, उस बंगाल में एक भी विधायक नहीं है. इस बार के चुनाव में भी पार्टी का खाता खुलता नजर नहीं आ रहा है. बंगाल के लगे त्रिपुरा में करीब ढाई दशक तक लेफ्ट का राज रहा, लेकिन मौजूदा समय में सिर्फ 11 विधायक ही उसके हैं.

    आजादी के बाद से लेफ्ट ने देश में अपने सियासी पैर पसारने शुरू कर दिए थे और कई राज्यों में अपने सियासी आधार स्थापित किया था. बिहार में एक समय लेफ्ट किंगमेकर रही है, लेकिन अब सिर्फ चंद सीटों पर ही सिमट कर रह गई है.

    झारखंड में लेफ्ट विचारधारा वाले दल के दो विधायक हैं. ये दोनों ही विधायक सीपीआई(माले) के टिकट पर जीते हैं. असम में CPI(M)के सिर्फ एक विधायक तो तमिलनाडु में सीपीएम और सीपीआई के दो-दो विधायक हैं. इस भी लेफ्ट ने असम में कांग्रेस और तमिलनाडु में डीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ी है. देखना है कि इस बार कितनी सीटें आती हैं,

    राजस्थान में फिलहाल लेफ्ट का कोई विधायक नहीं बचा जबकि 2023 से पहले उसके दो विधायक थे. महाराष्ट्र में लेफ्ट के एक विधायक हैं तो ओडिशा में सीपीएम के एक विधायक हैं. तेलंगाना में सीपीआई का एक विधायक है. इसके अलावा देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट का विधायक नहीं रह गया है. हालांकि, लेफ्ट देश के सभी राज्यों में चुनावी किस्मत आजमाती है?

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