महाराष्ट्र में फसल बीमा योजना में 8000 करोड़ का घोटाला, उद्धव ठाकरे का एकनाथ शिंदे पर हमला

मुंबई : शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र सरकार पर फसल बीमा योजना के जरिए 8,000 करोड़ रुपये के घोटाले की आशंका जताई है। उद्धव ठाकरे ने यह बात शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कही। उनके साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिंगोली जिले के वे किसान भी मौजूद थे, जिन्होंने अपना कृषि कर्ज चुकाने के लिए सरकार से उनकी किडनी, लिवर, आंखें खरीदने की अपील की थी। यह किसान हिंगोली से गुरुवार को मुंबई आए थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था। उद्धव ठाकरे ने कहा कि कल यह सभी किसान ‘मातोश्री’ आए थे। वे सांसद विनायक राउत से मिले थे। उसके बाद इन्हें नेता विपक्ष से मिलने के लिए भेजा गया था, ताकि संबंधित अधिकारियों से मिलकर उन्हें न्याय दिलाया जा सके। अचानक टीवी पर खबर देखी कि इन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। इसके बाद सांसद अरविंद सावंत और शिवसेना के विभाग प्रमुख संतोष शिंदे को उनकी मदद के लिए भेजा गया। पता चला कि इन सभी किसानों को आजाद मैदान पुलिस स्टेशन ले जाया गया है। आखिर इनका गुनाह क्या है? पुलिस ने इन्हें क्यों पकड़ा? इन किसानों ने जो हालत बयान किए हैं, वह आज राज्य के आम किसान की सच्ची स्थिति है।

‘बीमा कंपनियों के कार्यालय हैं बंद’
उद्धव ठाकरे ने कहा कि शिवसेना के नेता किसानों के खेतों में जाकर उनके नुकसान को अपनी आंखों से देख रहे हैं। जगह-जगह मोर्चे निकाल रहे हैं। मैंने अपनी पार्टी के सभी जिला प्रमुखों और पदाधिकारियों से कहा है कि जहां-जहां किसानों का नुकसान हुआ है, वहां-वहां कलेक्टर कार्यालयों तक मोर्चे निकाले जाएं और कलेक्टरों से सवाल पूछा जाए कि किसानों के नुकसान का पंचनामा हुआ क्या? इससे पहले हुए नुकसान का पंचनामा हुआ क्या? उसका मुआवजा कब मिलेगा? उद्धव ठाकरे ने कहा कि जब सरकार ने घोषणा की कि एक रुपये में फसल बीमा दिया जाएगा, तो राज्य भर में करीब पौने दो लाख किसानों ने फसल बीमा के लिए आवेदन किया। इसके लिए सरकार ने फसलों के बीमा के लिए सरकारी तिजोरी से 8,000 करोड़ रुपये फसल बीमा कंपनियों को दिए।

इतनी बड़ी रकम देने के बाद भी बीमा कंपनियों के कार्यालय बंद हैं। बीमा कंपनियों में कोई फोन तक नहीं उठाता। कोई उनसे कुछ पूछने वाला नहीं है। बीमा कंपनियां सरकार की भी नहीं सुन रहीं। किसानों की फसल बर्बाद हो गई है, लेकिन बीमे की रकम का भुगतान नहीं हो रहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि बीमा कंपनियों के नाम पर दिया गया यह पैसा आखिर किसकी जेब में गया है। इसकी जांच होनी चाहिए। यह करदाताओं का पैसा है। किसानों को बीमे की रकम कितनी मिलनी चाहिए और कितने के चेक मिल रहे हैं, यह भी देखा जाना चाहिए।

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