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अमेरिका के खिलाफ सब!

अमेरिका के खिलाफ चीन से सहयोग करने का दोष भारत पर भी लगाया गया है। इसके अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, और मेक्सिको जैसे देशों पर भी ऐसी ही तोहमत मढ़ी गई है।

डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन को अपनी जमीन से कटी नीतियों में कोई खोट नज़र नहीं आता! इसलिए उसके अधिकारी अपनी हर नाकामी का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने की कोशिश करने लगते हैं! उनकी सोच ऐसी है कि जैसे सारी दुनिया के अमेरिका के लिए है, इसलिए तमाम देशों को उसके हित में काम करना चाहिए! इसका ताजा उदाहरण ह्वाइट हाउस की रिपोर्ट है, जिसमें चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध में अमेरिका की नाकामी का दोष अमेरिका के करीबी सहयोगियों समेत 40 से ज्यादा देशों पर मढ़ा गया है। जिनको अमेरिका के खिलाफ चीन से सहयोग करने का दोषी बताया गया है, उनमें भारत भी है।

इसके अलावा जापान, दक्षिण कोरिया, कनाडा, और मेक्सिको जैसे देशों पर भी चीन से सहयोग करने की तोहमत मढ़ी गई है। ह्वाइट हाउस के मुताबिक इन देशों ने अरबों डॉलर के टैरिफ से बचने में चीनी कंपनियों को मदद की। ये देश ट्रांसशिपिंग में मददगार बने। यानी चीनी कंपनियों ने उन देशों को अपने उत्पाद भेजे, जिन पर अमेरिका ने कम टैरिफ लगाए हैं। फिर वहां से उन वस्तुओं को अमेरिका निर्यात किया गया। मगर ये इल्जाम भूमंडलीकरण के दौर में खुद अमेरिकी पहल पर दुनिया में बनी आपूर्ति शृंखला का स्वाभाविक परिणाम है। इन शृंखलाओं के तहत अधिकांश अंतिम उत्पाद विभिन्न देशों में बने पाट-पुर्जों पर निर्भर हैं।

चूंकि इस दौर में चीन ने खुद को ‘दुनिया के कारखाने’ के रूप में विकसित किया, तो लाजिमी है कि उस पर सबसे ज्यादा निर्भरता है। चीनी अर्थव्यवस्था के खास स्वरूप के कारण वहां बनी चीजें सस्ती पड़ती हैं, इसलिए भी अन्य देशों की कंपनियों के लिए वहां से आयात रोकना घाटे का सौदा बन जाता है। यही वजह है कि चीन के खिलाफ 2018 से शुरू अमेरिकी व्यापार युद्ध का ज्यादा असर नहीं हुआ है। चीन का निर्यात बढ़ता गया है। अमेरिका में भी अन्य स्रोतों से चीनी वस्तुओं का पहुंचना जारी है, जिसको लेकर ट्रंप प्रशासन के असंतोष का इजहार अब हुआ है। सबक यह है कि विश्व व्यापार की दिशा बदलने की कोई जादुई छड़ी मौजूद नहीं है, जिस बात को ट्रंप नहीं समझ पा रहे हैं।