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    एससी रिजर्वेशन में कोटे में कोटा मंजूर, सुप्रीम कोर्ट ने अपना 19 साल पुराना फैसला पलटा

    जनकल्याण टाइमBy जनकल्याण टाइमAugust 1, 2024Updated:August 2, 2024No Comments7 Mins Read
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    • 07 न्यायधीशों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला दिया
    • 01 जज ने उप-वर्गीकरण के फैसले को अनुचित ठहराया
    • 2004 के पांच जजों के निर्णय को शीर्ष अदालत ने रद्द किया

    नई दिल्ली। राज्य सरकारें अब अनुसूचित जाति, यानी SC के रिजर्वेशन में कोटे में कोटा दे सकेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (1 अगस्त) को इस बारे में बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने 20 साल पुराना अपना ही फैसला पलटा है। तब कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जातियां खुद में एक समूह हैं, इसमें शामिल जातियों के आधार पर और बंटवारा नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अपने नए फैसले में राज्यों के लिए जरूरी हिदायत भी दी है। कहा है कि राज्य सरकारें मनमर्जी से फैसला नहीं कर सकतीं। फैसला सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ का है। इसमें कहा गया कि अनुसूचित जाति को उसमें शामिल जातियों के आधार पर बांटना संविधान के अनुच्छेद-341 के खिलाफ नहीं है।

    दो शर्तें
    पहली: अनुसूचित जाति के भीतर किसी एक जाति को 100% कोटा नहीं दे सकतीं।
    दूसरी: अनुसूचित जाति में शामिल किसी जाति का कोटा तय करने से पहले उसकी हिस्सेदारी का पुख्ता डेटा होना चाहिए।

    फैसले का आधार
    अदालत ने फैसला उन याचिकाओं पर सुनाया है, जिनमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति और जनजातियों के आरक्षण का फायदा उनमें शामिल कुछ ही जातियों को मिला है। इससे कई जातियां पीछे रह गई हैं। उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए कोटे में कोटा होना चाहिए। इस दलील के आड़े 2004 का फैसला आ रहा था, जिसमें कहा गया था कि अनुसूचित जातियों को सब-कैटेगरी में नहीं बांट सकते।

    फैसले के मायने
    राज्य सरकारें अब राज्यों में अनुसूचित जातियों में शामिल अन्य जातियों को भी कोटे में कोटा दे सकेंगी। यानी अनुसूचित जातियों की जो जातियां वंचित रह गई हैं, उनके लिए कोटा बनाकर उन्हें आरक्षण दिया जा सकेगा।

    ============
    ::: क्या है आरक्षण में आरक्षण :::
    आरक्षण में आरक्षण से आशय पहले से आवंटित कोटे के भीतर एक अलग आरक्षण व्यवस्था लागू करना है। इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे पिछड़े और जरूरतमंद समूहों तक पहुंचे, जो आरक्षण प्रणाली के बावजूद उपेक्षित रह जाते हैं। इसका उद्देश्य आरक्षण के बड़े समूहों के भीतर छोटे, कमजोर वर्गों का अधिकार सुनिश्चित करना है ताकि वे भी आरक्षण का लाभ उठा सकें।

    ==============
    ::: संविधान में यह प्रावधान :::

    संविधान ने एससी-एसटी को विशेष दर्जा देते समय यह नहीं कहा कि इसमें कौन-कौन सी जातियां शामिल होंगी। ये अधिकार अभी केंद्र के पास है। अनुच्छेद 341 के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित जातियों को एससी और एसटी कहा जाता है। एक राज्य में अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित जाति दूसरे राज्य में नहीं भी हो सकती है।

    ::: राज्य क्या कर सकेंगे :::

    उच्चतम न्यायायल के फैसले के बाद राज्य सरकारें उप श्रेणी आरक्षण दे सकेंगी। राज्य सरकारें सामाजिक और आर्थिक आंकड़े एकत्रित कर विभिन्न उप श्रेणी का आकलन कर सकती हैं। इसके लिए सर्वे, जनगणना और शोध का सहारा लिया जा सकता है। इसके अलावा, विशेषज्ञों की समिति भी बनाई जा सकती है। ये समितियां विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर अपने सुझाव देंगी। लाभार्थियों की पहचान हो जाने के बाद उप श्रेणी का आरक्षण दिया जा सकेगा।

    ============
    ::: 4 कदम जो राज्यों को उठाने होंगे :::

    1. राज्य सरकार को उप श्रेणी आरक्षण को कानूनी मान्यता देने के लिए विधानमंडल में विधेयक पेश करना होगा।
    2. यदि कोई कानूनी अड़चन आती है तो सरकार इस पर न्यायिक समीक्षा के जरिए कोर्ट में स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
    3. पहले से मौजूद आरक्षण श्रेणियों का पुन: मूल्यांकन किया जा सकता है और उसमें बदलाव किया जा सकता है।
    4. निगरानी और समीक्षा के लिए स्वतंत्र संस्था गठित करनी होगी जिससे सुनिश्चित होगा कि आरक्षण का लाभ सही लोगों तक पहुंच रहा है।

    =============
    ::: देश में कितनी अनुसूचित जाति :::

    सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2018-19 में देश में 1,263 अनुसूचित जातियां थीं। अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, अंडमान और निकोबार एवं लक्षद्वीप में कोई समुदाय अनुसूचित जाति के रूप में चिह्नित नहीं है।

    ===============
    ::: वर्तमान में किसे कितना आरक्षण :::

    अनुसूचित जाति : 15 फीसदी
    अनुसूचित जनजाति : 7.5 प्रतिशत
    अन्य पिछड़ा वर्ग : 27 फीसदी

    आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग : 10 प्रतिशत

    ::: अभी दो राज्यों में व्यवस्था :::

    अभी केवल तमिलनाडु और कर्नाटक ने एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों के भीतर विभिन्न उप-श्रेणियों को आरक्षण देने की व्यवस्था की है। तमिलनाडु में पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, और अति पिछड़ा वर्ग जैसी उप-श्रेणियों में ओबीसी आरक्षण लागू किया गया है। इसी तरह कर्नाटक में अनुसूचित जाति के भीतर दो उप-श्रेणियों कोडवा और माडिगा को अलग-अलग आरक्षण दिया गया है।

    ==========
    ::: सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, सिर्फ राष्ट्रपति को अधिकार :::

    वर्ष 2004 में ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश सरकार से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जाति की सूची में जातियों को हटाने या जोड़ने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास है। संविधान सभी अनुसूचित जातियों को एकल सजातीय समूह मानता है। लेकिन छुआछूत जैसी सामाजिक असमानता को देखते हुए अनुसूचित जातियों को विशेष सुरक्षा प्रदान की गई। आरक्षण का लाभ आरक्षित जातियों के जरूरतमंदों तक पहुंचे, इसके लिए 2018 में क्रीमी लेयर की अवधारणा लागू की गई। यह नियम अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में लागू होता है जबकि अनुसूचित जाति पर यह 2018 में प्रमोशन के मामले में लागू किया गया।

    ===============
    ::: पंजाब सरकार ने बनाया था कानून :::

    1975 में पंजाब सरकार ने आरक्षित सीटों को दो श्रेणियों में विभाजित कर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण नीति पेश की। एक वाल्मीकि और मजहबी सिखों के लिए और दूसरी बाकी अनुसूचित जाति वर्ग के लिए। वर्ष 2006 में मामला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा और ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2004 के फैसले का हवाला दिया गया। इसके बाद इस नीति को रद्द कर दिया गया। चिन्नैया फैसले में कहा गया था कि एससी श्रेणी के भीतर सब कैटेगरी की अनुमति नहीं है क्योंकि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।
    पंजाब सरकार ने 2006 में वाल्मीकि और मजहबी सिखों को 50% कोटा देने के लिए फिर एक नया कानून बनाया, जिसे 2010 में फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने इस नीति को भी रद्द कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। मामला सात जज की बड़ी बेंच को भेजा गया। इस पर छह फरवरी 2024 को सुनवाई शुरू हुई।

    ============
    समीक्षा की जरूरत क्यों पड़ी:

    पंजाब के एडवोकेट जनरल गुरमिंदर सिंह ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया कि भर्ती परीक्षा में 56% अंक हासिल करने वाले पिछड़े वर्ग के सदस्य को 99% हासिल करने वाले उच्च वर्ग के व्यक्ति की तुलना में प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि उच्च वर्ग के पास कई सुविधाएं हैं, जबकि पिछड़ा वर्ग इन सुविधाओं के बिना ही संघर्ष करता है। इसलिए इस वर्ग को कोटा जरूरी है।

    ==============
    पिछले सुनवाइयों में क्या-क्या हुआ…

    6 फरवरी, 2024:

    सुनवाई के पहले दिन पंजाब सरकार ने दलील दी कि पिछड़े वर्गों में सबसे पिछड़े समुदायों की पहचान की जानी चाहिए। उन्हें रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने के लिए साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इस पर बेंच ने पूछा कि पिछड़ी जातियों में मौजूद संपन्न उपजातियों को आरक्षण की सूची से क्यों नहीं हटाया जाना चाहिए। साथ ही पूछा कि आईएएस-आईपीएस अफसरों के बच्चों को कोटा क्या मिलना चाहिए? इन्हें आरक्षण सूची से क्यों न निकाला जाए।

    7 फरवरी 2024:

    अदालत ने कहा कि एससी और एसटी अपनी आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक स्थिति के मामले में एक समान नहीं हो सकते हैं। ये एक निश्चित उद्देश्य के लिए एक वर्ग हो सकते हैं, लेकिन वे सभी उद्देश्यों के लिए एक श्रेणी नहीं बन सकते।

    8 फरवरी 2024:

    कोर्ट ने कहा- सबसे पिछड़ों को फायदा पहुंचाने के लिए दूसरों को बाहर नहीं किया जा सकता। मान लें कि कई सारे पिछड़ा वर्ग हैं और कोई राज्य केवल दो को चुनता है। ऐसे में जिन्हें बाहर रखा गया वे इसे चुनौती दे सकते हैं। हमें इसका एक पैमाना बनाना होगा।

    Quota within quota approved in SC reservation Supreme Court reversed its 19 year old decision
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