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    कॉलेज पॉलिटिक्स, वकालत, कांग्रेस और फिर बीजेपी… असम में हिमंत कैसे चढ़ते गए सत्ता की सीढ़ियां

    जनकल्याण टाइमBy जनकल्याण टाइमMarch 21, 2026No Comments4 Mins Read
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    असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने कॉलेज पॉलिटिक्स से सियासी सफर का आगाज किया था. मुख्य धारा की राजनीति के डेब्यू चुनाव में हिमंत को हार का सामना करना पड़ा था. दूसरे प्रयास में पहली जीत का स्वाद चखने वाले हिमंत न सिर्फ असम की सत्ता के शीर्ष पर काबिज हुए, बल्कि पूर्वोत्तर पॉलिटिक्स की धुरी बनकर भी उभरे.

    असम में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं और इन चुनावों में फोकस पॉइंट हैं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को सीएम हिमंत की अगुवाई में इस बार जीत की हैट्रिक लगाने की उम्मीद है. साल 1996 के असम चुनाव से चुनावी राजनीति में उतरे हिमंत का डेब्यू उतना शानदार नहीं रहा, जितना इसके बाद का सफर नजर आता है. पांच बार के विधायक सीएम हिमंत का शुरुआती जीवन, कॉलेज पॉलिटिक्स से कांग्रेस और बीजेपी… अब तक का सफर कैसा रहा है?

    एक फरवरी 1969 को असम के जोरहाट में जन्में हिमंत के पिता कैलाशनाथ सरमा साहित्यकार थे. उनकी गिनती असम के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार के रूप में होती है. हिमंत की मां मृणालिनी सरमा असम की साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी रहीं. गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई के दौरान वह ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़ गए. कॉटन कॉलेज की छात्र राजनीति से निकले हिमंत ने न सिर्फ असम की सत्ता के शीर्ष तक का सफर तय किया. बल्कि इससे भी कहीं आगे वह पूर्वोत्तर की सियासत की धुरी बनकर उभरे.

    जिसने किया मार्गदर्शन, उसी के खिलाफ चुनावी डेब्यू

    हिमंत बिस्वा सरमा ने कॉलेज पॉलिटिक्स के दिनों में प्रफुल्ल महंत और भुगु फुकन के साथ काम किया. यह दोनों ही चेहरे साल 1979 से 1985 तक चले असम आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से रहे. इन्होंने बाद में असम गण परिषद नाम से राजनीतिक पार्टी बना ली थी. हिमंत ने मुख्य धारा की राजनीति में जब कदम रखा, पहला विधानसभा चुनाव कॉलेज पॉलिटिक्स के दिनों में मार्गदर्शन करने वाले भृगु फुकन के ही खिलाफ लड़ा. वह साल 1996 था. हालांकि, हिमंत को तब शिकस्त झेलनी पड़ी थी.

    सैकिया ने दिया प्रोत्साहन, तरुण गोगोई ने तराशा

    हिमंत बिस्वा सरमा को राजनीति में आने के लिए तब के कद्दावर कांग्रेस नेता हितेश्वर सैकिया ने प्रोत्साहित किया. हितेश्वर सैकिया ने हिमंत को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहन दिया. हिमंत ने गुवाहाटी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी. साल 2001 के चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें जालुकबारी सीट से भृगु फुकन के ही खिलाफ उम्मीदवार बनाया.

    हिमंत ने अपने इस दूसरे प्रयास में भृगु फुकन को पटखनी दे दी. पहली बार के विधायक हिमंत को तरुण गोगोई ने मंत्री बनाया और कृषि, योजना जैसे अहम विभाग सौंपे. इसके बाद सियासी सफर में हिमंत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2006 और 2011 के असम चुनाव में भी जालुकबारी सीट से विधानसभा पहुंचे हिमंता को तरुण गोगोई ने कैबिनेट मंत्री बनाया.

    उन्होंने तरुण गोगोई की सरकार में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व भी संभाला. शिक्षक नियुक्ति के लिए टेस्ट से लेकर पांच मेडिकल कॉलेज खोलने तक, कई फैसले हिमंत के कार्यकाल की उपलब्धियों में गिने जाते हैं.

    2011 में कांग्रेस की जीत के रहे शिल्पकार

    साल 2011 के असम चुनाव में हिमंत ने गौरव गोगोई के साथ कांग्रेस के प्रचार अभियान की कमान संभाली. हिमंत, तरुण गोगोई की छत्रछाया में तेजी से सियासत में सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गए. जल्दी ही हिमंत बिस्वा सरमा ने असम कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में अपनी जगह बना ली. तरुण गोगोई के बाद हिमंत को असम कांग्रेस का चेहरा तक बताया जाने लगा था.

    हालांकि, साल 2012 में तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई ने सियासत में कदम रखा और इसके बाद हिमंत और तत्कालीन मुख्यमंत्री की कैमिस्ट्री बिगड़ती चली गई. तरुण गोगोई के साथ उनके रिश्ते तनावपूर्ण होते चले गए. इसे तरुण गोगोई के बाद की राजनीति के लिए एक तरह से उत्तराधिकार की लड़ाई से जोड़कर भी देखा जाता है.

    तरुण गोगोई से मतभेद, राहुल गांधी से तल्खी

    असम में कांग्रेस की सरकार के ताकतवर मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बीच मतभेद 2014 के आम चुनाव के बाद और बढ़ गए. साल 2014 में गौरव गोगोई चुनावी बाजी जीतकर लोकसभा पहुंच चुके थे. तरुण गोगोई के खिलाफ हिमंत ने मोर्चा खोल दिया और नेतृत्व परिवर्तन की मांग करते हुए दिल्ली दरबार का दरवाजा खटखटाया. हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में कहा भी था कि 2014 में मुख्यमंत्री बनने से उन्हें रोक दिया गया था

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