
जुहू की शाम और शंघाई से आई दोस्ती
जुहू की वो शाम
किसी आम शाम जैसी नहीं थी।
समंदर सामने था—
अनंत, गहरा और फैला हुआ…
लेकिन उस दिन उसकी लहरों में शोर नहीं था।
बस एक ठहरी हुई ख़ामोशी थी।
ऐसी ख़ामोशी,
जो चुप नहीं होती—
बल्कि बहुत कुछ कह रही होती है।
जैसे समंदर खुद
हमारी बातचीत सुन रहा हो,
हर शब्द को अपने भीतर समेट रहा हो,
और हर एहसास पर
धीरे से हामी भर रहा हो।
आसमान सांझ के रंगों में
धीरे-धीरे ढल रहा था—
नीला, केसरिया, सुनहरा…
और उन्हीं रंगों के बीच
ज़िंदगी की कई अधूरी–पूरी कहानियाँ
एक-दूसरे में घुलती जा रही थीं।
हवा में नमक की हल्की ठंडक थी,
लेकिन दिल के भीतर
यादों की एक अजीब-सी गर्माहट।

ऐसा महसूस हो रहा था
मानो वक़्त ने
खुद से थोड़ी देर के लिए
चलना रोक दिया हो।
उसी ठहरे हुए वक़्त में
मेरे सामने बैठे थे
मेरे दोस्त—
कुलदीप शर्मा जी।
हज़ारों किलोमीटर दूर,
चीन के शंघाई से आए हुए।
अलग देश,
अलग संस्कृति,
अलग समय-क्षेत्र,
और ज़िंदगी के अलग-अलग मोड़…
लेकिन जैसे ही नज़रें मिलीं,
एक पल के लिए भी यह एहसास नहीं हुआ
कि हम कभी दूर रहे हैं।

ऐसा लगा
जैसे कल ही की बात हो।
जैसे बातचीत के बीच
कभी कोई विराम आया ही न हो।
कुछ रिश्ते
समय से कमज़ोर नहीं होते,
बल्कि समय के साथ
और मज़बूत हो जाते हैं।
यह शाम
उसी सच्चाई की गवाह थी।
हम बातें कर रहे थे—
ज़िंदगी की,
काम की,
सपनों की,
संघर्षों की,
और उन अनदेखे रास्तों की
जिन्होंने हमें यहाँ तक पहुँचाया था।
हर शब्द के साथ
यह बात और साफ़ होती चली गई
कि फ़ासले मुलाक़ातों के दुश्मन नहीं होते।
असली दूरी तब पैदा होती है
जब दिलों के बीच
दीवारें खड़ी हो जाएँ।
और यहाँ तो दिल
पहले से ही
एक-दूसरे के बेहद क़रीब थे।
समंदर की लहरें
हर पल इस दोस्ती पर
जैसे अपनी मुहर लगा रही थीं—
कभी हल्की,
कभी गहरी…
बिल्कुल हमारी बातचीत की तरह।
कुलदीप जी की आँखों में
शंघाई की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी की चमक थी,
तो उनकी बातों में
हिंदुस्तान की मिट्टी की ख़ुशबू।
उसी पल
यह एहसास हुआ—
जो दोस्त दिल तक पहुँच जाए,
उसे शहर नहीं,
ज़माना याद रखता है।
हमने पुराने दिनों को भी याद किया—
जब सपने सिर्फ़ बातें हुआ करते थे।
और आज
उन्हीं सपनों के
सच होने की कहानियाँ
एक-दूसरे से साझा कर रहे थे।
हँसी भी थी,
संजीदगी भी,
और बीच-बीच में
वो ख़ामोश पल—
जहाँ शब्दों की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
बस साथ होना ही
काफ़ी होता है।
कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं—
न वे समय की पाबंदी मानते हैं,
न सफ़र का हिसाब रखते हैं।
वे बस अचानक
आपकी ज़िंदगी में आते हैं
और हमेशा के लिए
एक वजह बन जाते हैं—
मुस्कुराने की वजह,
भरोसा करने की वजह,
और यह मानने की वजह
कि इंसानियत
अभी ज़िंदा है।
जुहू की उस शाम ने
मुझे फिर याद दिलाया
कि दोस्ती किसी
कॉन्टैक्ट लिस्ट
या मुलाक़ातों की गिनती से नहीं मापी जाती।
दोस्ती तो
उस एहसास का नाम है
जो बरसों बाद भी
वैसा ही रहता है—
सच्चा,
गहरा,
और बेझिझक।
इसी एहसास के साथ
दिल से निकला
एक शब्द—
धन्यवाद।
धन्यवाद कुलदीप भाई,
इस शाम के लिए,
इस भरोसे के लिए,
और उस रिश्ते के लिए
जो बिना पूछे,
बिना शर्त,
हर हाल में
साथ खड़ा रहता है।
शायद ज़िंदगी की
असली पूँजी
इसी तरह की मुलाक़ातें होती हैं,
इसी तरह की दोस्तियाँ होती हैं—
जो कहानियों में बदलकर
ज़िंदगी को
वाक़ई यादगार
बना देती हैं।
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“यह कोई मिसाल नहीं…
यह वो दोस्ती है,
जिसकी मिसालें दी जाती हैं।”