
सांझ का समय था।
आसमान सुनहरे और केसरिया रंगों से सजा हुआ था, जैसे प्रकृति स्वयं किसी दिव्य आगमन का स्वागत कर रही हो। चारों ओर एक अलौकिक प्रकाश फैल रहा था—न तेज़, न धुंधला—बस इतना कि दिल को छू जाए।
उसी प्रकाश के मध्य खड़े थे साईं बाबा।
सफेद वस्त्र, शांत चेहरा, माथे पर करुणा की रेखाएँ और आँखों में ऐसा सुकून, मानो वर्षों की पीड़ा को एक नज़र में हर लेने की शक्ति हो।
उनकी गोद में एक नन्हा बालक था।
मासूम, निष्कपट, बिना किसी भय के—उस बच्चे की छोटी-सी बाँहें साईं बाबा के गले में थीं। जैसे वह कह रहा हो—
“दुनिया चाहे जैसी भी हो,
मुझे डर नहीं…
क्योंकि मेरे साईं मेरे साथ हैं।”
साईं बाबा ने बच्चे को थाम रखा था—
सिर्फ़ बाँहों से नहीं,
बल्कि अपने आशीर्वाद, विश्वास और प्रेम से।
चारों ओर अग्नि-सी आकृतियाँ थीं, लेकिन वे विनाश की नहीं थीं—
वे थीं अज्ञान को जलाने वाली लौ,
डर को राख करने वाली ऊर्जा,
और विश्वास को उजाला देने वाली ज्योति।
यह दृश्य केवल एक चित्र नहीं था।
यह एक संदेश था—
**“जो साईं की शरण में आ गया,
उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”**
आज की दुनिया में,
जहाँ इंसान इंसान से डरता है,
जहाँ भरोसा टूटता है,
जहाँ मासूमियत सबसे पहले कुचली जाती है—
वहाँ यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि
ईश्वर अभी भी हमारी गोद संभाले हुए है।
साईं बाबा की आँखों में भविष्य की चिंता नहीं थी,
क्योंकि वे जानते थे—
“जिसने मुझे पकड़ लिया,
उसे कल की चिंता करने की ज़रूरत नहीं।”
बच्चा साईं की ओर देख रहा था,
और साईं…
पूरी मानवता की ओर।
मानो वे कह रहे हों—
“हर इंसान मेरा बच्चा है,
चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या देश का हो।”
यही तो साईं का संदेश है—
सबका मालिक एक।
जब दिन ढलता है,
और शाम आती है,
तो सिर्फ़ अंधेरा नहीं आता—
बल्कि आत्ममंथन का समय आता है।
और तब साईं की यह छवि
हमसे धीरे से कहती है—
“शुभ संध्या…
चिंता छोड़ो,
भरोसा रखो,
और मुझे सौंप दो।”
विशेष प्रस्तुति एवं श्रेय
✍️ कहानी व भावार्थ
बॉलीवुड लेखक-निर्देशक

राजेश भट्ट साहब, मुंबई
(प्रेरित शैली में प्रस्तुति)
📰 जनहित संदेश के माध्यम से

जन कल्याण टाइम न्यूज़
📸 प्रस्तुति सहयोग

धनंजय राजेश गावड़े
प्रेस फ़ोटोग्राफ़र – जन कल्याण टाइम न्यूज़