
साँझ ढल चुकी थी…
मंदिर के प्रांगण में सैकड़ों दीपक जल रहे थे।
हर दीये की लौ जैसे किसी टूटे हुए इंसान की आख़िरी उम्मीद हो।
उसी उजाले के बीच, श्वेत संगमरमर में विराजमान थे — साईं बाबा।
उनकी आँखें बंद थीं,
लेकिन ऐसा लगता था मानो वे सब कुछ देख रहे हों।
हर दर्द… हर सवाल… हर टूटती आस्था।
उस शाम मंदिर में भीड़ नहीं थी,
पर जो भी आया था,
वह खाली हाथ नहीं आया था —
वह टूटे हुए सपने, हारी हुई हिम्मत
और अनकहे सवाल लेकर आया था।
कहानी एक आम इंसान की…
वह व्यक्ति कोई अमीर नहीं था,
न कोई बड़ा नाम…
बस एक आम आदमी था,
जिसने ज़िंदगी से बहुत कुछ माँगा
और बदले में बहुत कुछ खोया।
नौकरी छूट चुकी थी,
रिश्ते बिखर चुके थे,
और आत्मविश्वास…
वह तो कब का साथ छोड़ चुका था।
वह साईं बाबा के चरणों में बैठ गया।
कोई शब्द नहीं थे उसके पास।
बस आँखों में नमी थी।
और तभी…
मौन में एक आवाज़ गूँजी —
“सब्र रखो।”

साईं बाबा का संदेश — शब्दों में नहीं, अनुभव में
साईं बाबा कभी चमत्कार का वादा नहीं करते,
वे हिम्मत देते हैं।
वे कभी रास्ता आसान नहीं बनाते,
वे चलने की ताक़त देते हैं।
उनकी शिक्षा सीधी है —
“जो हुआ, उसे स्वीकार करो।
जो है, उसमें विश्वास रखो।
और जो आने वाला है, उसके लिए खुद को मजबूत बनाओ।”
दीपक सिर्फ़ रोशनी नहीं, प्रतीक है
मंदिर में जलते हर दीपक की तरह
ज़िंदगी भी कहती है —
अगर हवा तेज़ है,
तो लौ को और स्थिर बनाओ।
अगर अँधेरा गहरा है,
तो अपने अंदर का उजाला पहचानो।
एक रात, एक फैसला
उस इंसान ने मंदिर से निकलते वक्त
पीछे मुड़कर देखा।

साईं बाबा वही थे…
मुस्कान वही थी…
पर अब देखने वाला बदल चुका था।
वह समझ चुका था —
ईश्वर बाहर नहीं,
हमारे भीतर विश्वास बनकर रहता है।
जन-जन के लिए संदेश
आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में,
जहाँ इंसान मशीन बनता जा रहा है,
यह कहानी याद दिलाती है —
👉🏾 सफलता रातों-रात नहीं आती
👉🏾 दुख स्थायी नहीं होते
👉🏾 और आस्था कभी कमजोर नहीं होती
कमजोर तो हम तब होते हैं
जब खुद पर भरोसा छोड़ देते हैं।
अंतिम पंक्तियाँ (राजेश भट्ट शैली में):
“जब इंसान टूटता है,
तभी ईश्वर उसे गढ़ता है।
और जब आस्था ज़िंदा रहती है,
तो कोई अँधेरा आख़िरी नहीं होता।”
प्रस्तुति:

जनकल्याण टाइम्स, मुंबई
लेखनी की भावना में:

बॉलीवुड लेखक-निर्देशक
श्री राजेश भट्ट
प्रस्तुतकर्ता:

धनंजय राजेश गावड़े
प्रेस फोटोग्राफर

