2.6 C
New York

डर की रस्सी से आज़ादी (एक प्रेरणादायक दीर्घ कथा — जन-जन के नाम)✍️ कलम: राजेश लक्ष्मण गावड़े📢 माध्यम: जन कल्याण टाइम न्यूज़, मुंबई 📸 प्रस्तुति: धनंजय राजेश गावड़े (प्रेस फ़ोटोग्राफ़र) 🌐 आधिकारिक वेबसाइट: jankalyantime.in

Published:

मुंबई की सुबह…
जहाँ लोकल ट्रेन की सीटी से पहले लोगों के दिलों में डर जाग जाता है।
डर—आज का, कल का, हार का, खो देने का, कम पड़ जाने का।

इसी शहर में एक आम-सा इंसान रहता था।
नाम मान लो अर्जुन।
कोई बड़ा पद नहीं, कोई बड़ी पहचान नहीं—
बस एक साधारण चेहरा और भीतर असाधारण डर।

अर्जुन हर सुबह उठता,
आँखें खुलतीं तो सबसे पहले एक अनजानी घबराहट उससे पहले खड़ी होती।
“आज क्या होगा?”
“कल क्या होगा?”
“अगर वैसा नहीं हुआ जैसा मैं चाहता हूँ तो…?”

यही “अगर” उसके जीवन का सबसे भारी बोझ बन चुका था।
वह साँस तो ले रहा था,
पर जी नहीं रहा था।
वह चल तो रहा था,
पर मंज़िल से डरता था।

वह चाहता बहुत कुछ था—
अच्छा जीवन, सुकून, सम्मान, प्रेम—
पर खो देने के भय से
वह उन्हीं चीज़ों को कसकर पकड़े बैठा था
जो उसे बाँध रही थीं।

उसका पूरा जीवन
डर की एक अदृश्य रस्सी से बँधा हुआ था।

एक दिन…
समुद्र किनारे बैठा अर्जुन
लहरों को देख रहा था।
लहरें आतीं, टकरातीं, टूट जातीं—
और फिर भी समुद्र शांत रहता।

वहीं एक बुज़ुर्ग पास आकर बैठ गए।
न कोई उपदेश,
न कोई प्रवचन।
बस एक वाक्य—

“डरो मत… डर ही तो है जो तुम्हें जीने नहीं दे रहा।”

अर्जुन चौंका।
जैसे किसी ने उसके भीतर का सच बोल दिया हो।

बुज़ुर्ग बोले—
“तुम जीवन से नहीं,
अपने मन से हार रहे हो।
तुम अपने छोटे से डर को
इस महा-सागर जैसे जीवन से बड़ा समझ बैठे हो।”

अर्जुन ने कहा—
“पर अगर सब कुछ बिगड़ गया तो?”

बुज़ुर्ग मुस्कुराए—
“सुनो…
जो होगा, वही होना है।
और जो होना है,
वही अच्छे के लिए है।
यह बात तुम्हें कठोर लगती है
क्योंकि तुम जीवन पर भरोसा नहीं करते।”

वे आगे बोले—
“जीवन बहता है,
डर थामता है।
जीवन सिखाता है,
डर रोकता है।
जीवन तुम्हें आगे ले जाना चाहता है,
और डर तुम्हें पीछे खींचता है।”

अर्जुन ने पहली बार महसूस किया—
डर ने उसे कभी बचाया नहीं,
सिर्फ़ थकाया है।

उस रात
वह सोया तो डर के साथ नहीं,
भरोसे के साथ।

अगली सुबह
वही शहर था,
वही मुंबई,
वही भागती ज़िंदगी—
पर अर्जुन बदला हुआ था।

अब वह हर सवाल का जवाब
डर से नहीं,
विश्वास से देता था।

वह जान गया था—
जीवन परीक्षा नहीं,
अनुभव है।
यहाँ पास-फेल नहीं,
सिर्फ़ सीख होती है।

धीरे-धीरे
डर की रस्सी ढीली पड़ने लगी।
और एक दिन…
वह रस्सी टूट गई।

अर्जुन आज भी चलता है,
पर अब मंज़िल से नहीं डरता।
वह चाहता है,
और खोने से नहीं डरता।

क्योंकि अब उसे पता है—
डर एक लहर भी नहीं,
और जीवन एक महा-सागर है।


जन-जन के लिए संदेश

यह कोई दर्शन नहीं है।
यह कोई उपदेश नहीं है।
यह सिर्फ़ एक आईना है।

अगर आप यह पढ़ रहे हैं
और भीतर कोई डर बैठा है—
तो समझ लीजिए
आप जीवित हैं,
और जीवन आपको बुला रहा है।

डरो मत।
जीवन तुमसे बड़ा है।
और तुम सोचते हो उससे कहीं ज़्यादा मज़बूत।

Related articles

spot_img

Recent articles

spot_img