यह कहानी है एक ऐसे सिख की, जो न किसी गद्दी पर बैठा था, न किसी बड़ी हैसियत का मालिक था — फिर भी उसके विचार, व्यवहार और कर्म इतने ऊँचे थे कि जो भी उससे मिलता, अपने भीतर झाँकने को मजबूर हो जाता।
उसका नाम था सरदार हरप्रीत सिंह।
हरप्रीत सिंह का जीवन बहुत साधारण था। सिर पर सजी सफ़ेद पगड़ी, आँखों में गहराई और चेहरे पर हमेशा शांति की एक हल्की सी मुस्कान। वह कहता था —
“इंसान का असली धर्म उसका व्यवहार होता है।”
लालच से दूर रहने की सीख
हरप्रीत सिंह एक छोटी सी दुकान चलाता था। कम मुनाफ़े में भी वह खुश रहता, क्योंकि उसे पता था — लालच कभी पेट नहीं भरता, वह सिर्फ़ आत्मा को खोखला करता है।
एक दिन किसी व्यापारी ने उसे बेईमानी से बड़ा फायदा कमाने का प्रस्ताव दिया। हरप्रीत सिंह ने मुस्कराकर सिर्फ़ इतना कहा —
“जो रोटी दूसरों के हक़ की हो, वह गले से नीचे नहीं उतरती।”
उस दिन कई लोगों ने पहली बार समझा कि ईमानदारी नुकसान नहीं, सुकून देती है।
क्रोध पर विजय
गाँव में जब भी कोई झगड़ा होता, लोग हरप्रीत सिंह को बुलाते।
वह ग़ुस्से से भरे इंसान के सामने खामोशी से बैठ जाता। फिर शांति से कहता —
“क्रोध आग है, और आग में सबसे पहले खुद का घर जलता है।”
उसकी बातें किसी उपदेश जैसी नहीं लगती थीं, बल्कि दिल से निकली हुई सच्चाई लगती थीं।
धीरे-धीरे लोग समझने लगे कि शांति कमजोरी नहीं, सबसे बड़ी ताक़त है।
बेईमानी के ख़िलाफ़ जीवन दर्शन
हरप्रीत सिंह का मानना था कि बेईमानी सिर्फ़ पैसों में नहीं होती, वह रिश्तों, वादों और शब्दों में भी होती है।
वह अक्सर कहता —
“जो इंसान सच के साथ खड़ा रहता है, वह कभी अकेला नहीं होता — ईश्वर हमेशा उसके साथ होता है।”
आज के समय का सन्देश
आज जब समाज लालच, क्रोध और बेईमानी की दौड़ में भाग रहा है, ऐसे में हरप्रीत सिंह जैसे इंसान चलती-फिरती सीख हैं।
वह हमें याद दिलाता है कि —
इंसान बड़ा पैसों से नहीं, संस्कारों से होता है
ताक़त हाथ में नहीं, नियंत्रण में होती है
धर्म कपड़ों में नहीं, कर्मों में होता है
दर्शकों के लिए अंतिम संदेश
“अगर हर इंसान अपने भीतर के लालच को थोड़ा कम कर दे, क्रोध को समझदारी से बाँध ले और बेईमानी से खुद को दूर रखे — तो यही समाज स्वर्ग बन सकता है।”