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    ✍️ अधूरा सच और आज़ादी का असली अर्थ. लेखक: राजेश लक्ष्मण गवाडे, प्रधान संपादक, जन कल्याण टाइम्स न्यूज़, मुंबई

    जनकल्याण टाइमBy जनकल्याण टाइमAugust 17, 2025No Comments4 Mins Read
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    राजेश लक्ष्मण गावड़े

    मुख्य संपादक (जन कल्याण टाइम)

    भारत की आज़ादी का जश्न हर साल धूमधाम से मनाया जाता है। हमें बार-बार बताया जाता है कि “हम आज़ाद हैं, हमने तरक्की की है।” मगर जब सच की परतों को उघाड़कर देखें, तो तस्वीर धुंधली और अधूरी नज़र आती है। क्या यह वाकई आज़ादी है? आइए, इसे गहराई से समझें।


    1. मीडिया का मायाजाल: अधूरा सच

    आज का मीडिया – चाहे वह टीवी, सोशल मीडिया हो या अखबार – सत्ता के इशारों पर नाचता है। जनता को वही दिखाया जाता है, जो सत्ताधारी चाहते हैं। चमक-दमक, झूठे आंकड़े, और विकास के खोखले वादों की चाशनी में लपेटकर असल मुद्दों को दबा दिया जाता है। बेरोज़गारी, महंगाई, और भ्रष्टाचार जैसे सवाल गायब हो जाते हैं, और उनकी जगह ले लेते हैं चटपटे नारे और आधे-अधूरे सच।

    सवाल उठता है: अगर सच को दबाकर झूठ को परोसा जा रहा है, तो क्या हम वाकई आज़ाद हैं?


    2. आर्थिक तुलना: 1920 बनाम 2025

    1920 में 1 रुपये की कीमत इतनी थी कि उससे 70 डॉलर खरीदे जा सकते थे। आज तस्वीर उलट है – 1 डॉलर की कीमत 80 रुपये तक पहुँच चुकी है, और कई बार 100 रुपये को भी छू लेती है। यह गिरावट हमारी आर्थिक कमज़ोरी का जीता-जागता सबूत है।

    सच्चाई यह है: अगर हमने वास्तव में तरक्की की होती, तो हमारा रुपया मज़बूत होता, न कि दिन-ब-दिन कमज़ोर। हमारी अर्थव्यवस्था की यह हालत आज़ादी के असली मायने पर सवाल उठाती है।


    3. स्विस बैंक की तिजोरियाँ और सत्ता का लालच

    एक तरफ आम जनता महंगाई, बेरोज़गारी, और टैक्स के बोझ तले पिस रही है, वहीं दूसरी तरफ नेताओं और बड़े उद्योगपतियों का काला धन स्विस बैंकों में जमा हो रहा है। लाखों-करोड़ों रुपये देश से बाहर जा रहे हैं, और देश की संपत्ति विदेशी तिजोरियों में कैद हो रही है।

    सवाल यह है: जब देश का धन बाहर जा रहा है, तो “सोने की चिड़िया” का सपना कैसे पूरा होगा?


    4. टैक्स का बोझ: जनता की कमर टूटती है

    पहले के समय में टैक्स का बोझ इतना भारी नहीं था। आज हर नागरिक – चाहे गरीब हो या मध्यम वर्ग – प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों (इनकम टैक्स, GST, पेट्रोल-डीज़ल टैक्स) की मार झेल रहा है। टैक्स चुकाने के बाद भी बुनियादी सुविधाएँ – शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, और सुरक्षा – नाकाफी हैं।

    सवाल उठता है: अगर टैक्स के बदले सुविधाएँ नहीं, तो यह कैसी आज़ादी है?


    5. जनता का संघर्ष: ज़मीनी हकीकत

    हमें बताया जाता है कि भारत ने विकास की बुलंदियाँ छू ली हैं। मगर ज़मीनी हकीकत कुछ और कहती है:

    • महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि मध्यम वर्ग की ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।
    • बेरोज़गारी ने युवाओं का भविष्य अंधेरे में डुबो दिया है।
    • किसान कर्ज़ के बोझ तले दबे हैं, और आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं।

    सवाल यह है: अगर जनता का जीवन संघर्षमय है, तो विकास का ढोल कौन बजा रहा है?


    Group of demostrators with banners protest for job and equal salaries. Protestors people holding signs and posters on global strike for unemployment. Group of multiethnic men and women protesting outdoors with placards.

    6. असली आज़ादी: सपना या सच?

    सच्ची आज़ादी का मतलब सिर्फ झंडा फहराना या नारे लगाना नहीं है। असली आज़ादी तब होगी जब:

    • जनता आर्थिक गुलामी से मुक्त हो।
    • भ्रष्टाचार और काला धन देश की रगों से निकल जाए।
    • हमारा रुपया विदेशी मुद्राओं के सामने मज़बूत हो।
    • जनता को पारदर्शी व्यवस्था, ईमानदार नेतृत्व, और वास्तविक विकास मिले।

    सवाल यह है: अगर ये सब नहीं है, तो क्या हमारी आज़ादी पूरी है?


    निष्कर्ष: अधूरी आज़ादी का सच

    1947 में हमें अंग्रेज़ों से राजनीतिक आज़ादी मिली, यह सच है। मगर आर्थिक, सामाजिक, और मानसिक आज़ादी अभी भी अधूरी है। जब तक हर नागरिक को बुनियादी सुविधाएँ, सम्मान, और समृद्धि नहीं मिलेगी, तब तक “भारत पूरी तरह आज़ाद है” कहना एक अधूरा सच ही रहेगा।

    आइए, हम सब मिलकर सवाल उठाएँ, सच को उजागर करें, और उस आज़ादी के लिए लड़ें जो वाकई में हमारा हक है।

    🖋️ राजेश लक्ष्मण गवाडे
    प्रधान संपादक, जन कल्याण टाइम्स न्यूज़, मुंबई

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    यह पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं हैं,यह जीवन का कड़वा लेकिन सच्चा सत्य…

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