

राजेश लक्ष्मण गावड़े
मुख्य संपादक (जन कल्याण टाइम)
🔴 घटना की पृष्ठभूमि:
11 जुलाई 2006 की शाम को मुंबई की लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार 7 बम धमाके हुए थे, जो कि पीक आवर के दौरान पश्चिमी रेलवे की उपनगरीय ट्रेनों में हुए।
इन धमाकों में 189 लोगों की मौत हो गई थी और 800 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह घटना भारत के इतिहास के सबसे भयावह आतंकी हमलों में से एक मानी जाती है।

⚖️ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (जुलाई 2025):
बॉम्बे हाई कोर्ट की विशेष खंडपीठ ने 19 साल बाद इस केस में एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सुनाया।
12 आरोपियों में से 7 को बाइज़्ज़त बरी कर दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि—
✅ मामले में प्रस्तुत किए गए सबूत विश्वसनीय नहीं थे।
✅ कई गवाहों की गवाही संदेह के घेरे में थी।
✅ आरोपियों से ज़बरदस्ती स्वीकारोक्ति करवाई गई थी, जो कि कानून की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है।
✅ RDX और अन्य विस्फोटक सामग्री की बरामदगी को लेकर भी कोई ठोस सबूत नहीं मिले।
🧾 जिन्हें बरी किया गया उनके नाम:
- तनवीर अहमद अंसारी (जिनकी मृत्यु कोविड के दौरान हो गई थी)
- मोहम्मद मजीद शफी
- शेख मोहम्मद अली आलम
- मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी
- मुजम्मिल अताउर रहमान शेख
- सुहैल महमूद शेख
- जमीर अहमद लतीफुर रहमान शेख

📌 अदालत के मुख्य अवलोकन:
पुलिस द्वारा की गई जांच में कई प्रक्रियात्मक खामियां पाई गईं।
गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
फॉरेंसिक सबूतों में भी स्पष्टता नहीं थी।
जो स्वीकारोक्ति बयान कोर्ट में पेश किए गए, वो आरोपियों से मारपीट और दबाव में लिए गए थे।

🕊️ बाइज़्ज़त बरी के मायने:
इन आरोपियों ने लगभग 19 साल जेल में बिताए, जिनमें से कई अब अधेड़ हो चुके हैं।
उनके जीवन के दो दशकों में उन्होंने ना सिर्फ़ सामाजिक बहिष्कार झेला, बल्कि परिवार, रोज़गार और सम्मान सब कुछ खो दिया।
📣 प्रतिक्रियाएं:
मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह एक “न्याय की जीत है, लेकिन बहुत देर से मिला न्याय है”।
परिवार वालों ने कहा: “हमने वर्षों तक अपने बेटों को बेगुनाह साबित करने के लिए संघर्ष किया और आज हमारी सच्चाई सामने आई।”
🧭 अब सवाल उठते हैं:
क्या जांच एजेंसियों की लापरवाही और जल्दबाज़ी ने निर्दोषों को बलि का बकरा बना दिया?
जिनकी ज़िंदगियाँ बर्बाद हुईं, क्या उन्हें न्यायिक मुआवज़ा मिलेगा?
क्या असली अपराधी अब भी आज़ाद घूम रहे हैं?
🔚 निष्कर्ष:
मुंबई ट्रेन धमाके के केस में यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।
यह बताता है कि “देर से मिला न्याय, अन्याय के समान तो है—but सच्चाई कभी न कभी सामने आती है।”
🕊️ अब उम्मीद की जानी चाहिए कि दोषियों को सज़ा मिले और निर्दोषों को उनके खोए हुए सालों का न्याय भी।