

राजेश लक्ष्मण गावड़े
मुख्य संपादक (जन कल्याण टाइम)
“कर्म, जल और छल की सच्चाई”
“एक लौटा जल और मन में लाखों छल,
तो कैसे होगा हर समस्या का हल?”
यह पंक्तियाँ हमें गहराई से सोचने पर मजबूर करती हैं।
हम रोज़ मंदिर जाते हैं, भगवान को जल चढ़ाते हैं, दीप जलाते हैं — पर क्या हमारा मन भी उतना ही पवित्र होता है?
आज का इंसान बाहर से तो धार्मिक दिखता है, लेकिन मन में स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष और छल लिए बैठा होता है।
सवाल यह है कि जब मन ही अशुद्ध है, तो भगवान की कृपा कैसे प्राप्त होगी?
संदेश का सार:
- कर्म ही सच्चा पूजन है:
भगवान को जल चढ़ाना प्रतीक है, लेकिन असली भक्ति तब होती है जब हम अपने कर्मों को शुद्ध रखें।
हर दिन जल चढ़ाकर भी अगर हम दूसरों का बुरा सोचते हैं, किसी को धोखा देते हैं या अपने कर्मों में छल रखते हैं, तो वो पूजा व्यर्थ है। - जो बोओगे वही पाओगे:
जीवन एक खेत की तरह है।
अगर तुम प्रेम, दया, ईमानदारी और परिश्रम बोओगे —
तो सफलता, सम्मान और शांति का फल जरूर मिलेगा।
लेकिन अगर तुम नफरत, झूठ, चालाकी और लालच बोओगे —
तो जीवन में कड़वाहट, अकेलापन और असफलता ही हाथ लगेगी। - ईश्वर कर्म देखता है, दिखावा नहीं:
ईश्वर को तुम्हारे जल, नारियल या मिठाइयों की नहीं —
तुम्हारे दिल की सच्चाई और कर्मों की जरूरत है। - समाधान कर्म से ही निकलेगा:
हर समस्या का हल पूजा-पाठ से नहीं,
बल्कि सही निर्णय, सच्चा प्रयास और साफ़ नीयत से निकलेगा।
अंत में — एक विनम्र प्रेरणा:
“भले ही रोज़ मंदिर जाओ, लेकिन मंदिर जाते वक्त मन भी साफ़ करो।
भले ही जल चढ़ाओ, पर किसी के मन को मत जलाओ।
क्योंकि भगवान का आशीर्वाद कर्म से मिलता है, कर्मफल से नहीं बचता कोई।”
- सादर,
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प्रस्तुति: B. Ashish