
मुंबई: दहिसर में गुरुवार को हुए शूटआउट में जिस पिस्टल का इस्तेमाल किया गया था, उसका लाइसेंस यूपी पुलिस ने दिया था। यह लाइसेंस मॉरिस नोरोन्हा के बॉडीगार्ड अमरेंद्र मिश्रा के नाम था। गोलियां अमरेंद्र ने नहीं, मॉरिस ने चलाईं, लेकिन मुंबई क्राइम ब्रांच ने अमरेंद्र को इसलिए गिरफ्तार किया, क्योंकि उसने अपने आर्म्स लाइसेंस से मिली पिस्टल का गलत इस्तेमाल होने दिया। आर्म्स लाइसेंस दिए जाने के नियम क्या हैं, प्राइवेट लोगों में यह किसे दिया जाता है, महाराष्ट्र पुलिस में लंबे समय तक काम कर चुके पूर्व पुलिस अधिकारी दिनेश अग्रवाल ने विस्तार से इसकी जानकारी दी। अग्रवाल के अनुसार, लाइसेंस देते वक्त पुलिस यह देखती है कि सामने वाली की जान को कितना खतरा है। कई बार किसी को धमकी भरे फोन आते हैं, कई बार जांच एजेंसियों को भी किसी के बारे में अपने इनपुट्स मिलते हैं। कई बार लोगों का बिजनेस बड़ा होता है, उन्हें इस आधार पर अपनी जान का खतरा रहता है। ऐसे बहुत से लोग कई बार पुलिस को अप्लीकेशन देते हैं।
मुंबई में अप्लीकेशन पुलिस कमिश्नर को दी जाती है। खतरे की सच्चाई जानने के लिए कमिश्नर डीसीपी हेडक्वार्टर (वन) को अप्लीकेशन फॉरवर्ड करता है। वहां से यह अर्जी लाइसेंस ब्रांच को जाती है।
इंटेलिजेंस इनपुट पर बनती है रिपोर्ट
जिसने अर्जी दी, लाइसेंस ब्रांच वह अप्लीकेशन उस रीजन के अडिशनल सीपी को, वहां से फिर जोन के डीसीपी को और फिर संबंधित पुलिस स्टेशन के सीनियर पीआई को फॉरवर्ड की जाती है। सीनियर पीआई अपने लोकल इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर रिपोर्ट तैयार करता है और फिर वापस उसी प्रोटोकाल से अपनी रिपोर्ट पुलिस कमिश्नर ऑफिस पहुंचाता है। पुलिस कमिश्नर उसके बाद आर्म्स लाइसेंस देने या न देने पर अपना फैसला लेते हैं। छोटे शहरों में यह फैसला पुलिस अधीक्षक के पास होता है।
टूरिस्ट लाइसेंस भी मिलता है
रिटायर्ड पुलिस अधिकारी दिनेश अग्रवाल के अनुसार, लाइसेंस दो तरह के होते हैं। एक लोकल और एक ऑल इंडिया लाइसेंस। जिसे लोकल लाइसेंस मिला है, यदि उसे कुछ दिनों के लिए उस शहर से बाहर हथियार लेकर जाना है, जो उसे लोकल पुलिस को अप्लीकेशन देनी होगी। लोकल पुलिस फिर उसकी परमिशन दे देती है। मुंबई पुलिस के एक अन्य अधिकारी के अनुसार, इस तरह के लाइसेंस को टूरिस्ट लाइसेंस भी कहा जाता है। दूसरा लाइसेंस ऑल इंडिया होता है। लेकिन इस अधिकारी के अनुसार, इसके भी नियम होते हैं। जैसे मुंबई से बाहर किसी दूसरे राज्य में यदि किसी को आर्म्स लाइसेंस मिला है, वह व्यक्ति यदि स्थाई रूप से या कुछ महीने के लिए भी मुंबई रहने वाला है, तो उसे मुंबई पुलिस के डीसीपी हेडक्वार्टर (वन) को सूचना देनी पड़ेगी।
रिटायरमेंट के बाद पुलिस वालों को भी मिलता है लाइसेंस
दिनेश अग्रवाल ने लंबे समय तक महाराष्ट्र एटीएस में काम किया, कई हाई-प्रोफाइल केसों को इनवेस्टिगेशन किया। आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। वह कहते हैं कि वह जब रिटायर होने वाले थे, उन्होंने इस आधार पर ठाणे पुलिस में आर्म्स लाइसेंस की अप्लीकेशन दी कि उन्हें आतंकवादियों से जान को खतरा हो सकता है। अग्रवाल को पॉइंट 32 बोर रिवॉल्वर रखने का लाइसेंस मिल गया, जो पूरे महाराष्ट्र के लिए मान्य है। कई रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों को इसी तरह के लाइसेंस मिले हैं। जब अंडरवर्ल्ड का दौर पीक पर था, तब मुंबई में कई एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को पुलिस सर्विस में रहते हुए एके-47 तक रखने की परमिशन थी। जब ए. एन.राय मुंबई के पुलिस कमिश्नर बने, तो उन्होंने इन अधिकारियों से एके-47 वापस ले ली थी। एक अधिकारी के अनुसार, मुंबई पुलिस जिस किसी को आर्म्स का लाइसेंस देती है, तो वह लाइसेंस पूरे एमएमआर के लिए वैध होता है। पहले लाइसेंस एक साथ तक वैध होता था, अब तीन साल के बाद उसे रिन्यू करवा जा सकता है। लेकिन मुंबई में आर्म्स का लाइसेंस मिलना बहुत आसान नहीं होता, इसलिए कई लोग दूसरे राज्यों से या छोटे शहरों से लाइसेंस बनवा लेते हैं और फिर उसका दुरुपयोग करते हैं, जैसा गुरुवार को दहिसर शूटआउट के दौरान हुआ।
मॉरिस को इसलिए नहीं मिला लाइसेंस
यह भी कहा जा रहा है कि चूंकि मॉरिस नोरोन्हा के खिलाफ क्रिमिनल केस थे। वह कुछ केसों में अरेस्ट भी हुआ, इसलिए उसे पता था कि उसे उसके नाम से मुंबई में लाइसेंस मिलना नामुमकिन है। इसलिए उसने अपने बॉडीगार्ड के नाम से लाइसेंस मिली पिस्टल का खुद के लिए यूज करना शुरू किया।