पड़ोसी ने हमसे कहा, ‘‘निशानेबाज, भीख मांगना सबसे निंदनीय कार्य है. ऐसा करनेवाला अपना आत्मसम्मान खो देता है और देश व समाज पर बोझ बन जाता है. उसकी कोई उत्पादकता या प्रॉडक्टिविटी नहीं रहती. कोई अंधा, विकलांग लाचार व्यक्ति भीख मांगे तो उसकी मजबूरी समझ में आती है लेकिन हट्टा-कट्टा इंसान ऐसा करे तो आश्चर्य होता है कि यह कितना बेशर्म है.’’
हमने कहा, ‘‘भीख मांगना भी एक पेशा है. पुणे का भरत जैन देश का सबसे अमीर भिखारी है. उसके मुंबई और पुणे में करोड़ों रुपयों के मकान और दूकाने हैं. उसके बच्चे महंगे कान्वेंट स्कूल में पढ़ते हैं. भीख मांगने की कला में उसने स्पेशलाइजेशन किया है. लोग उसे दीन-दुखी मानकर, उसके आर्त स्वरों से पिघलकर भीख देते हैं. वह इस बीख के धंधे से मालामाल हुआ है लेकिन इतनी दौलत जमा करने के बावजूद अपनी भिक्षावृत्ति छोड़ नहीं रहा है. अपने पेशे के प्रति उसका बेहद लगाव या कमिटमेंट है. वह भीख मांगने में आनंद अनुभव करता है.’’
पड़ोसी ने कहा, ‘‘निशानेबाज, ऐसे नकली भिखमंगों को ठग करार देकर गिरफ्तार कर लेना चाहिए. ये लोगों का भावनात्मक शोषण या इमोशनल ब्लैकमेल करते हैं. वे गरीबी और लाचारी का ढोंग करके लोगों को बुद्धू बनाते हैं और उनकी मेहनत की कमाई का हिस्सा मुफ्त में हासिल करते हैं. लोगों को चाहिए कि असली और नकली भिखारी का फर्क पहचानें.’’
हमने कहा, ‘‘भिखारी की मानसिकता कभी नहीं बदल सकती. कोई उसे अच्छा कपड़ा दे तो भी वह जानबूझकर मैलेकुचैले फटे चीथड़े पहनेगा. न तो कभी नहाएगा न हजामत करवाएगा. कोरोना में साफसुथरे लोग मर गए लेकिन गंदे रहनेवाले भिखारियों को कुछ नहीं हुआ. सारी दुनिया में भिखमंगे पाए जाते हैं. जब किसी वीआईपी का दौरा होता है तो उन्हें पुलिसवाले हटा देते हैं लेकिन बाद में फिर अपने ठिकाने पर लौट आते हैं. मंदिरों के पास इनका जमघट रहता है जहां लोग पुण्यकार्य समझकर इन्हें भीख देते हैं. कहा गया है- उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान. सबसे बढ़िया खेती फिर व्यापार, उससे नीचे नौकरी और सबसे निकृष्ट भीख मांगना.’’
हमने कहा, ‘‘पुणे के करोड़पति भिखारी ने यह बात गलत साबित कर दी. वह अपना पेशा छोड़ने की बजाय भजन गाएगा- दाता एक राम, भिखारी सारी दुनिया!’’
