बलरामपुर का सिटी पैलेस देखकर एक बार लगता है जैसे हम मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनस के सामने खड़े हैं। इसे बलरामपुर राज घराने की ओर से बनवाया गया था। इस भवन की विशेषता है कि इसमें ईंटें काटकर नहीं लगाई गईं हैं बल्कि एक खास तरह की ईटों के निर्माण के लिए अलग से भट्ठा खोला गया था। इस भवन को बनने में चार साल लगे थे। कहते हैं कि सिटी पैलेस और मुंबई टर्मिनस को एक ही आर्किटेक्ट ने डिजाइन किया।
यही कारण माना जाता है कि उसने बलरामपुर सिटी पैलेस की इमारत जैसा ही मुंबई टर्मिनस बना दिया। लगभग 1870 के आसपास बना सिटी पैलेस पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। पैलेस में लगभग 150 कमरे हैं। ब्रिटिश हुकूमत में राजमहल के आसपास राज घराने के सैनिक निवास करते थे। इसी वजह से इस पैलेस की सुरक्षा अभेद्य थी। घोड़े व हाथियों को रखने के लिए विशेष इंतजामात थे।
सन् 1500 में बलरामपुर स्टेट इकौना राजा के अधीन था। बलरामपुर की तालुकेदारी हेमू चौधरी व बल्लभ बढ़ई के हाथ में थी। पहले बलरामपुर रामगढ़ गौरी के नाम से जाना जाता था। सन् 1835 में राजा जय नारायण सिंह ने बलरामपुर को जीत लिया। कालांतर में उनके वंशज महाराजा दिग्विजय सिंह बलरामपुर के राजा हुए। दिग्विजय सिंह के पांच रानियां थीं। उन्होंने रानियों के लिए सिटी पैलेस का निर्माण कराया था। महाराजा जयेन्द्र प्रताप सिंह बताते हैं कि राजमहल के आसपास सैनिकों के रहने का स्थान था। युद्ध होने पर तत्कालीन महाराजा अपने किले पटोहाकोट व बेला में चले आते थे। दुश्मन कभी इस पर हमला नहीं कर पाए।
ब्रिटिश हुकूमत मे तैयार हुआा था नक्शा
भवन का नक्शा ब्रिटिश हुकूमत काल में एक आर्किटेक ने तैयार किया था। उन्होंने ही मुम्बई रेलवे स्टेशन के टर्मिनस का नक्शा बनाया था। मुंबई टर्मिनस व सिटी पैलेस की आकृति एक जैसी दिखती है। उस समय सीमेंट के स्थान पर सुर्खी, मौरंग, गुड़, गोंद, जीरा, चूना आदि प्रयोग किया गया था। सिटी पैलेस में ईटे काटकर नहीं लगाई गईं थीं।
महाराजा जयेन्द्र प्रताप सिंह बताते हैं कि ईटों को अलग-अलग प्रकार के सांचे में ढालने के लिए ईट भट्ठे का निर्माण कराया गया था। भवन को बनाने में चार साल का समय लगा था। लगभग तीन हजार मजदूर व एक हजार कारीगर लगाए गए थे। सभी कारीगर बाहर से बुलाए गए थे। सिटी पैलेस की महत्ता आज भी बरकरार है। उसकी कभी रंगाई पुताई नहीं करानी पड़ी। नाग पंचमी व दशहरा के दिन आज भी हजारों श्रद्धालुओं का मेला यहां लगता है।
